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गुरुवार, 21 मार्च 2024

बेजुबान... Bejuban (Aadiwasi Kavita आदिवासी कविता)

                        


बेजुबान…

– डॉ. दिलीप गिऱ्हे

मनुष्य को छोड़कर
प्रकृति के हर एक कोने में
अनगिनत बेजुबान बसे हुए हैं—
जो बोलते नहीं,
पर बहुत कुछ कह जाते हैं।

पशुओं में—
शेर हैं, बाघ हैं,
हाथी हैं, बैल हैं,
बिल्ली, कुत्ते, खरगोश,
चूहे और भैंस भी—
हर एक अपने अस्तित्व के साथ
इस धरती को जीवंत बनाते हैं।

पक्षियों में—
मोर हैं, कोयल हैं,
तीतर हैं, चिड़ियाँ हैं—
जो हर सुबह
अपने मधुर स्वरों से
जीवन का संगीत रचते हैं।

वृक्षों में—
सागवान, पलाश,
पीपल, बरगद,
महुआ और नीम—
जो बिना कुछ कहे
हमें जीवन देते हैं,
छाया देते हैं,
सांसों का आधार बनते हैं।

ऐसे लाखों-करोड़ों
पशु, पक्षी, वृक्ष और प्राणी
इस पृथ्वी पर रहते हैं—
बेजुबान होकर भी
एक गहरी भाषा बोलते हैं।

वे अपनी खामोशी में
हमसे प्रश्न करते हैं—
“तुम कब तक
प्रकृति को नष्ट करते रहोगे?”

“कब तक जल, जंगल और जमीन को
अपने स्वार्थ के लिए
उजाड़ते रहोगे?”

ये नदियाँ, ये धरती, ये जंगल—
सब देख रहे हैं तुम्हें,
सब सह रहे हैं तुम्हें,
पर हमेशा चुप नहीं रहेंगे।

एक दिन—
जब संतुलन टूट जाएगा,
जब प्रकृति अपना धैर्य खो देगी,
तब यही बेजुबान
अपनी खामोशी से
तुम्हें जवाब देंगे।

यह जल, यह जमीन, यह जंगल
तुम्हारे किए का हिसाब लेंगे—
धीरे-धीरे,
पर निश्चित रूप से।

और तब—
जब तुम क्षमा माँगने खड़े होगे,
जब तुम अपने अपराधों से
मुक्त होना चाहोगे—
तब शायद बहुत देर हो चुकी होगी।

क्योंकि यह बेजुबान प्रकृति
हर बात सुनती है,
पर हर गलती को
माफ़ नहीं करती।

इसलिए अभी भी समय है—
इनकी खामोशी को समझो,
इनकी भाषा को पहचानो,
और उस संतुलन को बचाओ
जिस पर तुम्हारा अस्तित्व टिका है।

क्योंकि ये बेजुबान हैं—
पर निर्बल नहीं।



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