बुधवार, 8 अप्रैल 2026

बाबाराव मडावी की 'पंछी' कविता में सच्चाई के लोकतंत्र का आक्रोश || Babarao Madavi Ki Panchhi kavita ||


बाबाराव मडावी की 'पंछी' कविता में सच्चाई के लोकतंत्र का आक्रोश 

-Dr.Dilip Girhe

प्रास्ताविक:

मराठी के आदिवासी कवि बाबाराव मडावी की कविता 'पंछी' आदिवासी यथार्थ, संवेदना और व्यक्ति स्वतंत्रता को अभिव्यक्त करने वाली एक महत्वपूर्ण कविता कही जा सकती।  इस कविता का शीर्षक पंछी केवल पक्षी का नाम नहीं है तो वह पंछी समाज में रहने वाले हर शोषित, वंचित एवं दबे हुए वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। जिनकी स्वतंत्रता और सच्चाई को छिना गया हो। लेखक 'सच्चाई के लोकतंत्र' के माध्यम से  स्पष्ट करना चाहते हैं कि आज भारतीय संविधान के माध्यम से यह सच्चाई का लोकतंत्र जीवित है। जिसके माध्यम से सामान्य मनुष्य का श्रम और अधिकार को न्याय मिलता है। वर्तमान संदर्भों पर बात करे तो आज यह कविता उतनी ही प्रासंगिकता जितनी आवश्यक है। आज सरकारे विकास के नाम जिस तरह से आदिवासियों के संसाधनों को नष्ट कर रही है। यहाँ पर कवि 'सोने का पिंजड़ा' आधुनिक विकास का मोडेल के रूप में देखा गया है। जो कि हमें दिखने में तो बहुत आकर्षक दिखाई देता है। किंतु भीतर से देखा जाये तो कैदखाना नजर आता है। जैसे कि हम देखते हैं कि खनन और बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के कारण आदिवासी लोगों को उनके इलाकों से जबरन खदेड़ा जा रहा है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए कवि लोकतंत्र की वास्तविक सच्चाई और उसके भीतर छिपे आक्रोश को उजागर करते हैं । 

पंछी 

तू  पंख फड़फडाकर 

उड़ जा!

यहाँ के प्रदूषण से 

तेरी खुली सांसें 

घुट रही है।


तेरी सच्चाई का लोकतंत्र 

तेरी मेहनत के पसीने पर टिका है!

तेरे बच्चों का 

यह आक्रोश 

तेरी स्वतंत्रता के लिए है!


पंछी 

तुझे यहाँ कैद कर लिया है 

यहाँ के शोषकों ने 

सोने के पिंजड़े में 

यह सोने का पिंजड़ा 

तेरा कैदखाना है 

इस कैदखाने से 

तू पंख फड़फड़ाकर 

उड़ जा! (पंछी काव्य संग्रह-पृष्ठ संख्या २७)

-बाबाराव मडावी

यहाँ पर कवि बाबाराव मडावी विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से सच्चाई का लोकतंत्र को स्थापित करना चाहते हैं। इस कविता में 'पंछी' स्वाभिमान, सच्चाई, स्वतंत्रता और प्राकृतिक संसाधनों का प्रतीक है। जिसे वर्तमान व्यवस्था ने सोने के पिंजड़े में कैद कर लिया है। इसी कारण लेखक कविता के शुरुआत में ही पंछी को सोने के पिंजड़े से उड़ जाने की सलाह देते हैं। क्योंकि यहाँ का प्रदूषण उसकी स्वतंत्र साँसे घोंट रहा है। यहाँ पर लेखक भौतिक प्रदूषण बात नहीं कर रहे हैं बल्कि वे सामाजिक और मानसिक प्रदूषण का भी जिक्र कर रहे हैं। जिसमें अन्याय, शोषण और असमानता की नीतियाँ शामिल है। 'तेरी सच्चाई का लोकतंत्र तेरी मेहनत के पसीने पर टिका है'- इस काव्य पंक्ति के माध्यम से लेखक कहना चाहते हैं कि लोकतंत्र की असली नींव आम जनता की मेहनत और इमानदारी पर निर्भर है। किंतु यही लोग जब शोषणकारी नीतियों का शिकार हो जाते हैं तो उनके भीतर का आक्रोश ऐसे ही बाहर आ जाता है। यह आक्रोश एक व्यक्ति का नहीं तो समूह का दिखाई पड़ता है। जिसकी मुख्य नींव स्वतंत्रता है।  दूसरी ओर 'सोने का पिंजड़ा' भी यहाँ पर प्रतीकात्मक रूप में आया है। यह सोने का पिंजड़ा उसी झूठी चमक-दमक बातों का प्रतीक है। जो नजदीक से देखें तो बहुत आकर्षक दिखता है किंतु अंदर जाकर देखें तो एक प्रकार का कैद खाना है। शोषक व्यवस्था ने इसी पिजड़े के अंदर पंछी को कैद कर लिया है। जिसके कारण उस पंछी की स्वतंत्रता छिन ली गई है। आज के समय में भी यही स्थिति आदिवासी समाज के संबंध में मौजूद है, क्योंकि उनको बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के कारण विस्थापित होना पड़ रहा है। उनको शहरों में जाकर मजदूरी करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। उनको कम मुआवजा तो मिलता है किंतु उन्हें अपनी संस्कृति, पहचान और स्वतंत्रता खोनी पड़ती है।  इस सोने के पिंजड़े में बहुत सी सुविधाएँ तो हैं किंतु स्वतंत्रता का अभाव है।  अतः कवि कहना चाहते हैं कि पंछी तू इस कैद से निकलकर बाहर आ जा जहाँ तेरा लोकतंत्र खड़ा है।  यह संदेश आज के समाज के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जहाँ हर व्यक्ति को अपने अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए जागरूक होना आवश्यक है। 

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि पंछी कविता सामाजिकता और प्रतिरोध की गहराईयों को व्यक्त करती है।  यह कविता हमें सीख देती है कि सच्चा लोकतंत्र को केवल नाम में नहीं तो उसे व्यवहार में प्रयोग करना चाहिए, जहाँ पर हर एक व्यक्ति स्वतंत्रता, समता और बंधुता का भाईचारा प्राप्त कर सकें।  यहाँ पर पंछी पक्षी का आक्रोश उन सभी लोगों का है जो लोग अन्याय-अत्याचार और शोषण का शिकार हुए हैं।  आज विकास और प्रगति के नाम पर कमजोर वर्गों के अधिकारों पर अनदेखा किया जा रहा है।  इसी वजह से आज के लोकतंत्र में समानता और न्याय दोनों जीवित होना आवश्यक है।  तभी एक समतामूलक समाज स्थापित हो सकता है और सामाजिक परिवर्तन का संदेश दिया जा सकता है। 

संदर्भ:

पंछी काव्य संग्रह (लेखक-बाबाराव मडावी-अनुवाद डॉ.दिलीप गिऱ्हे) पृष्ठ संख्या-२७


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