कोई तो सुनो हमारी आक्रोश की ध्वनियाँ
-Dr. Dilip Girhe
हम लड़ रहे हैं
अपने हक़ के लिए,
अपने अधिकारों के लिए,
अपने अस्तित्व के लिए—
सदियों से दबे
उन सवालों के लिए,
जो आज भी जवाब मांगते हैं।हम उठ खड़े हुए हैं
अन्याय की दीवारों के सामने,
समानता के सूरज की चाह में,
सम्मान की रोशनी के लिए।लेकिन तब भी—
यहाँ के शहरों की सड़कों पर
हमारे कदमों की आहट
अनसुनी रह जाती है।यहाँ का जिला प्रशासन
कानों में खामोशी भरकर
फाइलों में हमें बंद कर देता है।यहाँ के विधायक,
यहाँ के मुख्यमंत्री,
यहाँ के सांसद,
यहाँ की राज्यसभा—
सबके शब्दों में वादे हैं,
पर हमारी पीड़ा का कहीं अता-पता नहीं।यहाँ के प्रधानमंत्री,
यहाँ के राष्ट्रपति—
लोकतंत्र के ये ऊँचे स्तंभ भी
हमारी आवाज़ से क्यों अनजान हैं?क्या हमारी चीखें
इतनी धीमी हैं
या सत्ता के गलियारों में
संवेदनाएँ ही खो गई हैं?हम तो बस
हमारा संवैधानिक मान-सम्मान मांग रहे हैं,
वो अधिकार
जो हमें जन्म से मिलने चाहिए थे।हम मांग रहे हैं—
स्वतंत्रता,
समता,
और बंधुता का वह सपना,
जो संविधान के पन्नों में ही नहीं,
हमारे जीवन में भी उतरना चाहिए।हमारी आँखों में
उम्मीद की लौ अब भी जल रही है,
पर हर अनसुनी पुकार
उसे बुझाने की कोशिश करती है।फिर भी हम रुकेंगे नहीं,
झुकेंगे नहीं—
जब तक हमारी आवाज़
इस व्यवस्था की नींद नहीं तोड़ देती।कोई तो सुनो—
हमारी आक्रोश की ध्वनियाँ,
कोई तो समझो—
हमारे मौन में छिपी चीखों को।क्योंकि
जब आवाज़ें दबाई जाती हैं,
तो इतिहास गवाह है—
आक्रोश एक दिन
क्रांति बनकर गूंजता है।

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