बाबाराव मड़ावी की ‘पंछी’ कविता : वर्तमान सामाजिक संदर्भों का दस्तावेज
-Dr. Dilip Girhe
प्रस्तावना:
कविता समाज की वास्तविकताओं, संघर्षों और मानवीय संवेदनाओं का सजीव दर्पण होती है। बाबाराव मड़ावी की कविता “पंछी” वर्तमान सामाजिक संदर्भों को गहराई से प्रस्तुत करने वाली एक प्रभावशाली रचना है। इसमें “पंछी” के माध्यम से कवि ने आम मनुष्य, विशेषकर शोषित और संघर्षरत वर्ग की स्थिति को प्रतीकात्मक रूप में व्यक्त किया है। यह कविता केवल एक पक्षी की उड़ान का वर्णन नहीं करती, बल्कि मनुष्य की स्वतंत्रता, अस्मिता और आत्मसम्मान की खोज को उजागर करती है।
आधुनिक युग में जहाँ तकनीकी प्रगति और भौतिक विकास तेजी से बढ़ रहा है, वहीं सामाजिक असमानता, मानसिक दबाव, शोषण और पर्यावरणीय प्रदूषण जैसी समस्याएँ भी गहराती जा रही हैं। कविता में वर्णित “सोने का पिंजड़ा” आधुनिक जीवन की उस चमक-दमक का प्रतीक है, जो बाहर से आकर्षक दिखाई देती है, पर भीतर से व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर देती है। कवि समाज को जागरूक करते हुए यह संदेश देता है कि सच्ची स्वतंत्रता आत्मबल, जागरूकता और संघर्ष से प्राप्त होती है।
इसी दृष्टि से यह कविता वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों का एक सशक्त दस्तावेज बनकर सामने आती है, जिसमें आम जनजीवन की पीड़ा और मुक्ति की आकांक्षा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
पंछी
कविता का भावार्थ :
कविता में “पंछी” स्वतंत्रता की चाह रखने वाले मनुष्य का प्रतीक है। कवि उसे पंख फैलाकर उड़ जाने की प्रेरणा देता है, जो यह दर्शाता है कि मनुष्य को अपने अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए साहसपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए। आज के समय में यह संदेश विशेष रूप से युवाओं और शोषित वर्ग के लिए महत्वपूर्ण है, जो अनेक सामाजिक और आर्थिक बंधनों से जूझ रहे हैं।
“यहाँ के प्रदूषण से तेरी खुली साँसें घुट रही है”—यह पंक्ति केवल पर्यावरणीय प्रदूषण नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक प्रदूषण का संकेत देती है। भ्रष्टाचार, भेदभाव और नकारात्मक विचारधाराएँ मनुष्य की स्वतंत्र सोच को बाधित करती हैं।
“तेरी सच्चाई का लोकतंत्र तेरी मेहनत के पसीने पर टिका है”—यहाँ कवि बताता है कि समाज की वास्तविक शक्ति आम लोगों की मेहनत और ईमानदारी में निहित होती है। मजदूर, किसान और आम नागरिक ही राष्ट्र की प्रगति का आधार हैं।
“तेरे बच्चों का यह आक्रोश तेरी स्वतंत्रता के लिए है”—यह पंक्ति अगली पीढ़ी की जागरूकता और बदलाव की चाह को दर्शाती है। वर्तमान समय में युवा वर्ग सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रहा है, जो सकारात्मक परिवर्तन का संकेत है।
कविता के अगले भाग में पंछी को शोषकों द्वारा “सोने के पिंजड़े” में कैद दिखाया गया है। यह आधुनिक जीवन की भौतिक सुविधाओं और दिखावटी सुख का प्रतीक है, जो मनुष्य को बाहरी रूप से सुखी दिखाते हैं, पर भीतर से उसे बंधनों में जकड़ देते हैं। कवि अंत में पंछी को इन बंधनों को तोड़कर स्वतंत्र उड़ान भरने की प्रेरणा देता है। यह आत्मनिर्भरता, साहस और जागरूकता का संदेश है।
निष्कर्ष
समग्र रूप से बाबाराव मड़ावी की “पंछी” कविता वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों का सजीव चित्र प्रस्तुत करती है। इसमें स्वतंत्रता की आकांक्षा, शोषण के विरुद्ध संघर्ष और आत्मसम्मान की भावना प्रमुख रूप से उभरकर सामने आती है। कवि यह स्पष्ट करता है कि आधुनिक जीवन की चमक-दमक कई बार मनुष्य को वास्तविक स्वतंत्रता से दूर कर देती है।
कविता का मुख्य संदेश यह है कि सच्ची स्वतंत्रता बाहरी सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि आत्मबल, जागरूकता और संघर्ष में निहित होती है। यह रचना पाठकों को अपने जीवन और समाज की वास्तविकताओं पर विचार करने तथा अन्याय और बंधनों के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणा देती है। इस प्रकार “पंछी” कविता केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि वर्तमान सामाजिक संदर्भों का एक सशक्त और प्रेरणादायक दस्तावेज सिद्ध होती है।
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