बाबाराव मड़ावी की 'आग' कविता में सत्ता विकास और मानव समूह की संवेदना
-Dr.Dilip Girhe
प्रस्तावना:
कविता साहित्य की वह सशक्त विधा है जो कम शब्दों में गहरे भाव, विचार और यथार्थ को अभिव्यक्त करती है। प्रस्तुत कविता “आग” इसी शक्ति का मार्मिक उदाहरण है। यह कविता ऊपर से देखने पर जंगल की आग और उसमें नष्ट हुए एक पक्षी के घोंसले की कथा प्रतीत होती है, परंतु गहराई से देखने पर यह रचना मानव समाज की संवेदनहीनता, पर्यावरण विनाश और निर्दोष जीवन के प्रति उपेक्षा पर तीखा प्रहार करती है। कवि ने प्रकृति के एक छोटे से दृश्य को आधार बनाकर आज के व्यापक सामाजिक यथार्थ को सामने रखा है।
कविता में वर्णित जंगल की आग केवल भौतिक अग्नि नहीं है, बल्कि वह लालच, लापरवाही, हिंसा और तथाकथित विकास की प्रतीकात्मक आग है। इस आग में केवल पेड़-पौधे ही नहीं जलते, बल्कि असंख्य मासूम प्राणी, सपने और भविष्य भी राख हो जाते हैं। घोंसले में पड़े अंडे और बच्चे उन निर्दोष वर्गों के प्रतीक हैं, जो समाज की गलत नीतियों और निर्णयों का शिकार बनते हैं। वहीं, चारा लेकर लौटने वाली पक्षी-माँ आम जनमानस, विशेषकर मातृत्व की उस पीड़ा का प्रतीक है, जो अपने बच्चों को बचा न पाने की असहायता से गुजरती है।
कविता का सबसे प्रभावशाली पक्ष उसका प्रश्नवाचक स्वर है— “यह आग किसने लगाई?” यह प्रश्न केवल जंगल की आग तक सीमित नहीं है, बल्कि आज के समाज में घटित हर अन्याय, दुर्घटना और विनाश पर लागू होता है। कवि पाठक को उत्तर देने के लिए मजबूर करता है और उसकी संवेदना को झकझोरता है।
इस प्रकार “आग” कविता केवल एक भावुक दृश्य नहीं, बल्कि वर्तमान समाज, पर्यावरण संकट और मानवीय मूल्यों के क्षरण पर आधारित एक गंभीर वैचारिक रचना है, जो पाठक को सोचने, समझने और जिम्मेदारी स्वीकार करने की प्रेरणा देती है।
आग
-बाबाराव मड़ावी
कविता का भावार्थ:
यह कविता “आग” अत्यंत मार्मिक प्रतीकात्मक रचना है, जो केवल जंगल की आग या एक पक्षी के घोंसले के नष्ट होने की कथा नहीं कहती, बल्कि वर्तमान समाज की संवेदनहीनता, मानव-जनित विनाश और सत्ता व विकास के नाम पर होने वाले अपराधों पर गहरा प्रश्न खड़ा करती है। इस कविता को आज के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अनेक वास्तविक घटनाओं से जोड़कर समझा जा सकता है।
कविता में जंगल की आग से पेड़ की पत्तियों में बना घोंसला जलकर नष्ट हो जाता है। उस घोंसले में मौजूद अंडे और बच्चे कोयला बन जाते हैं। यह दृश्य केवल एक प्राकृतिक दुर्घटना नहीं है, बल्कि निर्दोष जीवन के नष्ट होने का प्रतीक है। आज के समाज में हम रोज़ ऐसे ही दृश्य देखते हैं—जहाँ विकास, लाभ, राजनीति या लापरवाही की आग में सबसे पहले कमज़ोर, निर्दोष और असहाय लोग जलते हैं।
वर्तमान समय में जंगलों में लगने वाली अधिकांश आग प्राकृतिक नहीं बल्कि मानव-जनित होती है। कभी अवैध खनन के लिए, कभी लकड़ी माफिया द्वारा, कभी खेती के लिए जंगल साफ़ करने के उद्देश्य से आग लगाई जाती है। ठीक उसी तरह जैसे कविता में प्रश्न उठता है— “यह आग किसने लगाई?”—आज भी यह प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है। दोष कोई स्वीकार नहीं करता, पर परिणाम मासूम प्राणों को भुगतना पड़ता है। यह स्थिति केवल जंगलों तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के हर स्तर पर दिखाई देती है।
इस कविता की पक्षी-माँ आज के समाज की आम माँ का प्रतीक बन जाती है। जैसे वह अपने बच्चों के लिए चारा लेकर लौटती है और राख के सिवा कुछ नहीं पाती, वैसे ही आज कई माँएँ रोज़गार, बेहतर भविष्य या सुरक्षा की तलाश में निकलती हैं और लौटकर अपने बच्चों को खो देती हैं। उदाहरण के लिए, औद्योगिक दुर्घटनाएँ, झुग्गी बस्तियों में आग लगना, कारखानों में सुरक्षा की अनदेखी, या प्रदूषण से होने वाली मौतें—इन सभी में सबसे अधिक प्रभावित गरीब और मज़दूर वर्ग होता है। उनकी मेहनत से व्यवस्था चलती है, लेकिन आपदा आने पर वही सबसे पहले कुचले जाते हैं।
कविता में राख जमा करना और आँसू बहाना उस लाचार शोक का प्रतीक है, जहाँ पीड़ित के पास सवाल के अलावा कुछ नहीं बचता। आज भी जब किसी पुल के गिरने, ट्रेन दुर्घटना या गैस रिसाव जैसी घटनाओं में लोग मरते हैं, तब जाँच समितियाँ बनती हैं, बयान दिए जाते हैं, पर असली दोषी अक्सर बच निकलते हैं। आम आदमी की आँखों में भी वही सवाल होता है— “यह आग किसने लगाई?” लेकिन उत्तर सत्ता, व्यवस्था और लालच की परतों में दब जाता है।
यह कविता पर्यावरण संकट से भी सीधा संबंध रखती है। आज जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और जैव विविधता के विनाश के कारण असंख्य प्रजातियाँ समाप्त हो रही हैं। पक्षियों के घोंसले उजड़ रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं और धरती का संतुलन बिगड़ रहा है। फिर भी विकास के नाम पर यह सब जायज़ ठहराया जाता है। कविता इस विकास की अमानवीय कीमत पर सवाल उठाती है।
सामाजिक स्तर पर यह कविता हिंसा और युद्ध की भी याद दिलाती है। युद्धों में नीतियाँ बनाने वाले सुरक्षित रहते हैं, लेकिन मरते हैं निर्दोष बच्चे, उजड़ती हैं माँएँ, और राख बन जाते हैं सपने। चाहे वह युद्धग्रस्त देश हों, दंगे हों या आतंकवादी हमले—हर जगह वही प्रश्न गूंजता है: “यह आग किसने लगाई?”
इस कविता की सबसे बड़ी शक्ति उसका प्रश्नवाचक अंत है। कवि कोई उत्तर नहीं देता, क्योंकि शायद उत्तर हम सब जानते हैं, लेकिन स्वीकार नहीं करना चाहते। यह आग किसी एक व्यक्ति ने नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक उदासीनता, लालच और स्वार्थ ने लगाई है। जब हम अन्याय देखकर चुप रहते हैं, प्रकृति का शोषण करते हैं, या केवल अपने लाभ के बारे में सोचते हैं, तब हम भी उस आग में ईंधन डालते हैं।
“आग” कविता वर्तमान समाज का दर्पण है। यह हमें झकझोरकर पूछती है कि क्या हम केवल रोने और सवाल पूछने तक सीमित रहेंगे, या उस आग को बुझाने की जिम्मेदारी भी लेंगे। यह कविता हमें संवेदनशील, जिम्मेदार और जागरूक नागरिक बनने का आह्वान करती है—ताकि भविष्य में किसी और माँ को राख बटोरते हुए यह प्रश्न न पूछना पड़े कि “यह आग किसने लगाई?”
निष्कर्ष :
कविता “आग” के समग्र अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि यह रचना केवल प्रकृति की एक दुर्घटना का चित्रण नहीं करती, बल्कि मानव-निर्मित संकटों और सामाजिक अन्याय की गहरी आलोचना प्रस्तुत करती है। कविता का अंत किसी समाधान या उत्तर के साथ नहीं होता, बल्कि एक तीखे प्रश्न के साथ होता है। यही प्रश्न इसे साधारण कविता से अलग और अधिक प्रभावशाली बनाता है। “यह आग किसने लगाई?”—यह पंक्ति पाठक के मन में देर तक गूंजती रहती है।
वर्तमान समाज के संदर्भ में यह कविता अत्यंत प्रासंगिक है। आज विकास, औद्योगीकरण और शहरीकरण की दौड़ में मनुष्य प्रकृति और कमजोर वर्गों की अनदेखी कर रहा है। जंगलों की कटाई, प्रदूषण, विस्थापन, युद्ध, दंगे और औद्योगिक दुर्घटनाएँ—यही दर्शाती हैं कि समाज में विनाश की आग लगातार फैल रही है। इस आग का सबसे बड़ा शिकार वे लोग बनते हैं, जिनकी आवाज़ कमजोर होती है—गरीब, बच्चे, महिलाएँ, श्रमिक और प्रकृति स्वयं।
पक्षी-माँ का शोक और उसकी आँखों में उठता प्रश्न आज के आम नागरिक की पीड़ा बन जाता है। वह रो सकता है, सवाल कर सकता है, पर व्यवस्था के सामने असहाय बना रहता है। कविता इसी असहायता को उजागर करती है और हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या हम केवल मूक दर्शक बने रहेंगे या इस आग को फैलने से रोकने का प्रयास करेंगे।
निष्कर्षत; “आग” कविता हमें संवेदना, जिम्मेदारी और आत्ममंथन का संदेश देती है। यह रचना चेतावनी है कि यदि मनुष्य ने समय रहते अपनी सोच और कार्यों में परिवर्तन नहीं किया, तो यह आग केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे समाज और मानवता को अपनी चपेट में ले लेगी। अतः यह कविता हमें जागरूक नागरिक बनने और मानवीय मूल्यों की रक्षा करने का आह्वान करती है।
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