घर वापसी
– डॉ. दिलीप गिऱ्हे
आदिवासियों!
आपको करनी होगी घर वापसी—
अपने मूल की ओर,
अपनी जड़ों की ओर,
अपनी अस्मिता की ओर।भूमंडलीकरण के इस तेज़ दौर में
आप भाग रहे हैं—
सौ की रफ़्तार से,
एक ऐसी दिशा में
जहाँ चमक तो है,
पर अपनी पहचान धुंधली पड़ती जा रही है।यह दौड़ केवल आगे बढ़ने की नहीं,
कभी-कभी यह
अपने ही अस्तित्व से दूर जाने की दौड़ बन जाती है—
जहाँ संस्कृति पीछे छूट जाती है,
और अस्मिता सवालों में घिर जाती है।इसलिए अब ज़रूरत है
रुककर सोचने की,
और फिर दौड़ने की—
पर इस बार
अपनी संस्कृति की ओर।सौ की नहीं,
हज़ारों की रफ़्तार से—
ताकि हम फिर से गढ़ सकें
अपनी पहचान की सशक्त तस्वीर,
जिसमें झलकती हो
आदिवासियत की गरिमा,
उसकी सादगी,
और उसकी गहराई।आप अपनाते हैं
दूसरों के त्योहार,
उनकी परंपराएँ,
उनके रीति-रिवाज—
यह गलत नहीं,
परंतु…क्या इसी प्रक्रिया में
आप अपनी परंपराओं को
भूलते तो नहीं जा रहे?क्या आपकी बोली,
आपके गीत,
आपके नृत्य,
आपकी जीवन-पद्धति
धीरे-धीरे विलुप्त तो नहीं हो रही?सवाल यह नहीं
कि आप क्या अपना रहे हैं,
सवाल यह है
कि आप क्या खो रहे हैं।आदिवासी होना
केवल एक पहचान नहीं,
यह एक जीवन-दर्शन है—
प्रकृति के साथ संतुलन का,
समूह के साथ सामंजस्य का,
और परंपराओं के साथ आत्मीयता का।इसलिए 'घर वापसी'
किसी स्थान की ओर लौटना नहीं,
बल्कि अपने भीतर लौटना है—
अपने इतिहास में,
अपने मूल्यों में,
अपने स्वाभिमान में।आइए,
हम फिर से पहचानें
अपने होने का अर्थ,
और गर्व से कह सकें—
हम आदिवासी हैं,
और हमारी संस्कृति
हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।

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