-Dr. Dilip Girhe
प्रस्तावना;
भारतीय साहित्य में कविता केवल भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, बल्कि समाज की वास्तविकताओं, संघर्षों और परिवर्तन की आकांक्षाओं का भी सशक्त दस्तावेज़ होती है। विशेष रूप से आदिवासी और ग्रामीण जीवन से जुड़ी कविताएँ उस समाज की पीड़ा, संघर्ष और चेतना को उजागर करती हैं, जिसे लंबे समय तक मुख्यधारा के विमर्श में पर्याप्त स्थान नहीं मिला। इसी संदर्भ में बाबाराव मड़ावी की कविता ‘सज़ग’ अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। यह कविता शोषित और वंचित वर्ग की उस सामूहिक चेतना को व्यक्त करती है, जो अन्याय, असमानता और छल के विरुद्ध उठ खड़ी होने की प्रेरणा देती है। भारतीय ग्रामीण समाज में लोकतंत्र की जड़ें गहरी हैं, परंतु कई बार सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ और सत्ता के केंद्रीकरण के कारण लोकतांत्रिक मूल्यों को सही रूप में लागू नहीं किया जा सका। गाँवों में रहने वाले आदिवासी, किसान और श्रमिक वर्ग लंबे समय तक शोषण और उपेक्षा का सामना करते रहे हैं। बाबाराव मड़ावी की कविता इसी सामाजिक यथार्थ को सामने लाती है और यह संकेत देती है कि अब यह समाज धीरे-धीरे जागरूक हो रहा है। कविता में ‘सज़ग’ शब्द केवल जागरूकता का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, आत्मसम्मान और परिवर्तन की इच्छा का भी प्रतीक है। कवि यह स्पष्ट करता है कि जब समाज ज्ञान और शिक्षा के प्रकाश से जागृत होता है, तब वह अन्याय के विरुद्ध संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए खड़ा हो सकता है। इस प्रकार बाबाराव मड़ावी की कविता ‘सज़ग’ केवल एक काव्य रचना नहीं, बल्कि ग्रामीण लोकतंत्र, सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना का सशक्त घोष भी है। इस कविता के माध्यम से कवि यह संदेश देता है कि जब गाँवों का सामान्य व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होगा, तभी सच्चे अर्थों में लोकतंत्र का उजाला समाज के प्रत्येक कोने तक पहुँच सकेगा।
सज़ग
शोषित व्यवस्था के सीने पर
नाच-नाच कर थक गया हूँ
तब भी ये लोग
हमारे साथ छल करना
क्यों नहीं छोड़ते?
मनुष्यों को गुलाम करने वाले
तुम्हारी विकृत वृत्ति के मनसूबे
कब तक रहेंगे
अब ज्ञान के उजाले से
हमारे हाथों में
नई क्रांति के शस्त्र खड़े हैं!
स्वतंत्रता, समता और बंधुता पर
हमला करके
हमारे तन की लंगोट
छीनने वालों
अब हम सजग हो गए हैं
अपने गाँवों में लोकतंत्र
का उजाला लाने के लिए!
-बाबाराव मड़ावी
बाबाराव मड़ावी की कविता ‘सज़ग’ शोषण के विरुद्ध जागरूकता और संघर्ष की चेतना को व्यक्त करने वाली एक प्रभावशाली कविता है। यह कविता विशेष रूप से आदिवासी, किसान और ग्रामीण समाज की उस पीड़ा को सामने लाती है, जो लंबे समय से शोषण, अन्याय और छल का सामना करता आया है। कवि इस कविता के माध्यम से यह बताना चाहता है कि अब समाज में जागृति आ रही है और लोग अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रहे हैं। कविता की प्रारम्भिक पंक्तियों में कवि कहता है कि वह शोषित व्यवस्था के सीने पर नाच-नाचकर थक चुका है। इसका आशय यह है कि गरीब और वंचित वर्ग लंबे समय से अन्याय और शोषण के विरुद्ध संघर्ष करता आ रहा है, लेकिन सत्ता और प्रभुत्वशाली वर्ग बार-बार छल और धोखे से उन्हें दबाने की कोशिश करता रहा है। आज भी समाज में कई स्थानों पर भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता और आर्थिक शोषण देखने को मिलता है। उदाहरण के लिए कई गाँवों में विकास योजनाओं का लाभ वास्तविक पात्रों तक नहीं पहुँच पाता और बीच में ही भ्रष्ट तंत्र उसे हड़प लेता है। कवि आगे कहता है कि मनुष्यों को गुलाम बनाने वाली विकृत मानसिकता कब तक चलती रहेगी। यह पंक्ति उस मानसिकता पर प्रहार करती है जो समाज में ऊँच-नीच, भेदभाव और अन्याय को बनाए रखना चाहती है। आज के समय में शिक्षा और जागरूकता के कारण लोग अपने अधिकारों के प्रति अधिक सचेत हो रहे हैं। संविधान द्वारा दिए गए अधिकार—स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—के आधार पर लोग अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठा रहे हैं।
कविता में 'ज्ञान के उजाले' का उल्लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि शिक्षा और जागरूकता समाज में परिवर्तन का सबसे बड़ा साधन है। आज डिजिटल माध्यम, सोशल मीडिया और शिक्षा के प्रसार के कारण गाँवों तक जानकारी और जागरूकता पहुँच रही है। उदाहरण के लिए कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अब अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आवाज़ उठा रहे हैं और पंचायत स्तर पर पारदर्शिता की माँग कर रहे हैं। कविता के अंतिम भाग में कवि कहता है कि जो लोग स्वतंत्रता, समता और बंधुता पर हमला करते हैं और गरीबों की न्यूनतम आवश्यकताओं तक छीन लेते हैं, उनके विरुद्ध अब लोग सजग हो गए हैं। यहाँ 'लंगोट छीनने वालों' का अर्थ है वह शोषक वर्ग जो गरीबों को उनके मूल अधिकारों और सम्मान से भी वंचित कर देता है। वर्तमान समय में यह कविता अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होती है। आज भारत में ग्रामीण लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए पंचायती राज व्यवस्था लागू है, जिसके माध्यम से गाँवों में लोगों की भागीदारी बढ़ी है। जब ग्रामीण समाज शिक्षित और जागरूक होकर लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाता है, तब ही वास्तविक लोकतंत्र स्थापित हो सकता है। बाबाराव मड़ावी की यह कविता केवल शोषण की पीड़ा को ही व्यक्त नहीं करती, बल्कि संघर्ष, जागरूकता और लोकतांत्रिक चेतना का संदेश भी देती है। कवि का विश्वास है कि जब समाज सजग होकर अपने अधिकारों के लिए खड़ा होगा, तब गाँवों में सच्चे लोकतंत्र का उजाला अवश्य फैलेगा।
निष्कर्ष :
उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि बाबाराव मड़ावी की कविता ‘सज़ग’ केवल शोषण के विरुद्ध आक्रोश की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह सामाजिक जागरण और लोकतांत्रिक चेतना का भी सशक्त घोष है। इस कविता में कवि ने आदिवासी, किसान और ग्रामीण समाज की पीड़ा को अत्यंत सरल लेकिन प्रभावशाली शब्दों में व्यक्त किया है। साथ ही यह भी बताया है कि जब तक समाज अज्ञान और भय की स्थिति में रहता है, तब तक शोषक शक्तियाँ उसे दबाने का प्रयास करती रहती हैं। कविता का मूल संदेश यह है कि शिक्षा, जागरूकता और संगठन ही वह शक्ति है, जिसके माध्यम से शोषित समाज अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है। 'ज्ञान के उजाले' और 'नई क्रांति के शस्त्र' जैसे प्रतीक यह दर्शाते हैं कि आज का समाज धीरे-धीरे अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग हो रहा है। यही जागरूकता लोकतंत्र को मजबूत बनाने का आधार बनती है। वर्तमान समय में जब ग्रामीण क्षेत्रों में लोकतांत्रिक संस्थाएँ जैसे पंचायतें, ग्रामसभाएँ और स्थानीय स्वशासन की व्यवस्थाएँ सक्रिय हो रही हैं, तब इस कविता का महत्व और भी बढ़ जाता है। यदि ग्रामीण समाज शिक्षित और जागरूक होकर इन संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी करता है, तो गाँवों में पारदर्शिता, समानता और न्याय की स्थापना संभव हो सकती है। अतः यह कहा जा सकता है कि बाबाराव मड़ावी की कविता ‘सज़ग’ सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणा देने वाली रचना है। यह कविता हमें यह संदेश देती है कि जब शोषित समाज अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होकर संगठित होता है, तब वह अन्याय और असमानता के विरुद्ध सफलतापूर्वक संघर्ष कर सकता है। अंततः यही जागरूकता और सामूहिक चेतना गाँवों में सच्चे लोकतंत्र के उजाले को स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करती है।
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