संकट की गहराई
— डॉ. दिलीप गिऱ्हे
संकट की जड़ें
सिर्फ वर्तमान में नहीं,
बल्कि गहराई से धँसी हैं
हमारी भाषा की आत्मा में,
हमारे शब्दों की स्मृतियों में।
हमारी भाषा—
सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं,
बल्कि वह दर्पण है
जिसमें झलकती है
हमारी पहचान,
हमारा इतिहास,
हमारी परंपराएँ
और हमारी जीवन शैली।
हर शब्द में बसी है
पूर्वजों की अनुभूति,
हर लोकगीत में गूँजती है
हमारी सांस्कृतिक धड़कन,
और हर कथा में जीवित है
हमारा अस्तित्व।
लेकिन आज—
वैश्वीकरण के इस दौर में
यह सब कुछ
एक गहरे संकट से गुजर रहा है।
आदिवासी भाषा,
संस्कृति और अस्तित्व
धीरे-धीरे
खतरे के घेरे में आ रहे हैं।
प्राकृतिक संसाधनों की लूट
सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं,
बल्कि वह छीन रही है
हमारी जड़ों को,
हमारे जीवन के आधार को।
हमें दूर रखा जा रहा है
सत्ता और शक्ति के केंद्रों से,
जहाँ हमारे भविष्य के निर्णय होते हैं,
पर हमारी आवाज़
शामिल नहीं होती।
एक सुनियोजित प्रयास है—
भाषा को कमजोर करने का,
साहित्य को भुला देने का,
संस्कृति को मिटा देने का,
ताकि हमारी सामाजिक धरोहर
कभी खड़ी न हो सके
प्रतिरोध बनकर।
यह सिर्फ संकट नहीं,
यह एक चुनौती है—
हमारे अस्तित्व की,
हमारी पहचान की।
इसलिए आवश्यक है—
भाषा का संरक्षण,
साहित्य का प्रचार,
और संस्कृति का पुनर्जीवन।
जरूरत है
एक सशक्त सांस्कृतिक आंदोलन की,
जो न सिर्फ बचाए
हमारी भाषा और साहित्य को,
बल्कि उन्हें
नई पीढ़ी के दिलों में
फिर से जीवित कर दे।
क्योंकि—
जब तक भाषा जीवित है,
तब तक संस्कृति जीवित है,
और जब तक संस्कृति जीवित है,
तब तक
हमारा अस्तित्व भी अडिग रहेगा।

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