साहित्य का समकालीन परिप्रेक्ष्य और डॉ. पुनीता जैन का योगदान
समकालीन हिंदी साहित्य में आदिवासी साहित्य ने बीते कुछ दशकों में एक सशक्त और स्वतंत्र पहचान अर्जित की है। यह साहित्य केवल हाशिए के समाज की पीड़ा का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि वह एक वैकल्पिक जीवन-दृष्टि, दर्शन और सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। इसी संदर्भ में समालोचक डॉ. पुनीता जैन का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे लगभग एक दशक से हाशिए के स्वरों—विशेषतः दलित और आदिवासी साहित्य—को गहराई, संवेदनशीलता और वैज्ञानिक आलोचनात्मक दृष्टि से देखने-समझने के महत्वपूर्ण कार्य में संलग्न रही हैं।
डॉ. पुनीता जैन की आलोचनात्मक यात्रा:
वर्ष 2017 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘हिंदी दलित आत्मकथाएँ : एक मूल्यांकन’ ने दलित आत्मकथात्मक साहित्य की वैचारिक, सामाजिक और सौंदर्यात्मक विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए हिंदी आलोचना में एक सशक्त हस्तक्षेप किया। इसके पश्चात वर्ष 2023 में आई उनकी पुस्तक ‘आदिवासी कविता : चिंतन और सृजन’ आदिवासी काव्य-जगत के बहुरंगी, बहुवचनात्मक और जीवन-संलग्न स्वरूप को सामने लाने वाला एक महत्वपूर्ण ग्रंथ सिद्ध हुई।
इसी आलोचनात्मक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए डॉ. पुनीता जैन की नवीनतम पुस्तक ‘आदिवासी साहित्य : उपन्यास, कहानी और कथेतर’ आदिवासी साहित्य के गद्यात्मक और कथेतर आयामों का समग्र अध्ययन प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक न केवल चयनित रचनाओं का परिचय कराती है, बल्कि पाठक की अंतःसंवेदना को उद्बोधित करने में भी सफल होती है।
पुस्तक की विषयवस्तु और क्षेत्रीय व्यापकता:
यह पुस्तक झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत तथा विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी भारत के प्रमुख आदिवासी रचनाकारों की रचनाओं को समेटते हुए एक अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक परिदृश्य निर्मित करती है। इसमें शामिल उपन्यास, कहानियाँ और कथेतर रचनाएँ आदिवासी जीवन के विविध पक्षों—संघर्ष, अस्मिता, प्रकृति-सम्बंध, सामुदायिकता और सांस्कृतिक निरंतरता—को प्रामाणिक रूप में अभिव्यक्त करती हैं।
डॉ. पुनीता जैन की दृष्टि की विशेषता यह है कि वे रचनाओं को केवल साहित्यिक पाठ के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि उन्हें उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों में रखकर विश्लेषित करती हैं। इस कारण यह पुस्तक आदिवासी साहित्य की संपूर्ण पृष्ठभूमि को समझने का एक भरोसेमंद माध्यम बन जाती है।
आदिवासी साहित्य की वैचारिक और सांस्कृतिक विशिष्टता
आदिवासी साहित्य अपनी दार्शनिक, सांस्कृतिक, सामुदायिक, ऐतिहासिक और बहुवचनात्मक पृष्ठभूमि के कारण मुख्यधारा के साहित्य से भिन्न और विशिष्ट है। इसमें प्रकृति, जीव-जगत और वनस्पति-जगत के साथ मनुष्य के संबंध को अलग दृष्टि से देखा जाता है—जहाँ प्रकृति उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन-सहचरी है। समुदाय, साझेदारी और सामूहिक चेतना यहाँ जीवन-मूल्य के रूप में उपस्थित हैं।
इस साहित्य में गैर-आदिवासी रचनाकारों की वे रचनाएँ भी स्वीकार्य रही हैं, जिनमें आदिवासी जीवन के प्रति ईमानदार दृष्टि और गहरी संवेदना दिखाई देती है। डॉ. पुनीता जैन इस तथ्य को रेखांकित करती हैं कि आदिवासी साहित्य किसी संकीर्ण दायरे में बंधा हुआ नहीं है, बल्कि वह मानवीय सरोकारों से जुड़ा एक व्यापक साहित्यिक क्षेत्र है।
आधुनिकता और आदिवासी पीड़ा का दस्तावेज़:
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वह तथाकथित आधुनिकता और सामंती-संस्कारों से युक्त व्यवस्था द्वारा आदिवासियों और आदिवासियत पर किए गए अत्याचारों, विस्थापन, शोषण और सांस्कृतिक क्षरण की पीड़ा को उजागर करती है। इन रचनाओं के माध्यम से वह करुण आर्त्तनाद सुनाई देता है, जो विकास के नाम पर उजड़ते जीवन और टूटते समुदायों की सच्ची कहानी कहता है। यही पक्ष इस पुस्तक को वैचारिक रूप से सार्थक और सामाजिक रूप से अत्यंत प्रासंगिक बनाता है।
कुल मिलाकर ‘आदिवासी साहित्य : उपन्यास, कहानी और कथेतर’ केवल एक आलोचनात्मक पुस्तक नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के जीवन, संस्कृति, संघर्ष और चेतना को समझने का एक समग्र दस्तावेज़ है। डॉ. पुनीता जैन की पैनी दृष्टि, संतुलित विवेचना और संवेदनशील प्रस्तुति इस कृति को आदिवासी साहित्य के अध्ययन हेतु एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ के रूप में स्थापित करती है। यह पुस्तक विश्व पुस्तक मेले में सामयिक प्रकाशन के स्टॉल पर आप सभी के लिए उपलब्ध है।

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