स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासियों का योगदान
मूल लेखक:बाबाराव मड़ावी
अनुवाद:डॉ. दिलीप गि-हे
आदिवासियों के स्वतंत्रता संघर्ष का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। सन् 1778 से 1946 तक लंबे समय चले आदिवासी संघर्ष ब्रिटिश कंपनी और स्थानीय जमींदारों के खिलाफ थे। एक ही समय में ब्रिटिश सत्ता और अपने ही शोषकों के विरोध में यह संघर्ष भड़क उठा था। उस समय जमींदार अंग्रेजों से मिलकर आदिवासियों पर अत्याचार करते थे, जिसके कारण आदिवासियों की जमीनें उनसे छीन ली गईं। आदिवासियों के रक्त में गुलामी न होने के कारण उन्होंने अपने संपूर्ण स्वतंत्रता के लिए जगह-जगह विद्रोह किए। जंगलों में रहने वाले आदिवासियों ने ब्रिटिश गुलामी स्वीकार नहीं की, जिसके परिणामस्वरूप अनेक स्थानों पर बगावत हुई। मनुवादी इतिहासकारों ने आदिवासी क्रांतियों के इतिहास को उजागर नहीं होने दिया। शूद्र-अतिशूद्रों को दबाए रखने की साजिश में आदिवासियों का तेजस्वी और प्रखर इतिहास सामने नहीं आ सका। बाल मजदूरी के शोषण के खिलाफ तमन्चारं डोरा आंदोलन, महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष, जमीन पर कब्जा वापस लेने तथा संपूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए आदिवासियों ने युद्ध छेड़े। बिहार का आदिवासी क्षेत्र विद्रोह का केंद्र बना। 1786 से 1795 के बीच बिहार के छोटानागपुर क्षेत्र में तमाड और उसके बाद चेरो जनजातियों ने संघर्ष किया। इसके पश्चात महानायक क्रांतिवीर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के लिए “उलगुलान” नामक भीषण आंदोलन हुआ, जिसमें ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रचंड संघर्ष हुआ। इस संघर्ष की ज्वाला आज भी शांत नहीं हुई है।
भिल्लों की जमीनें राजपूत जमींदारों ने हड़प लीं। 1812 में गुजरात-राजस्थान की सीमा क्षेत्र में भिल्लों ने आत्मसम्मान की एक बड़ी आंदोलन खड़ी की। मध्यप्रदेश के तंट्या भिल्ल ने 1857 के विद्रोह से प्रेरित युवाओं के साथ आदिवासी स्वतंत्रता और समाज में हो रहे जुल्म-अत्याचार के खिलाफ सेना तैयार की, जिससे अंग्रेज भयभीत हो गए। तंट्या भिल्ल का प्रभाव और साहस दूर-दूर तक फैल गया। अन्याय का प्रतिकार करते हुए वह शोषण करने वालों को कठोर दंड देता था। बिरसा मुंडा की तरह तंट्या के लिए भी अंग्रेजों ने मजबूत बेड़ियाँ तैयार की थीं। अंततः अंग्रेजी शासन ने 1888 में तंट्या को फांसी दे दी।
जमींदारों, साहूकारों, पूंजीपतियों और अंग्रेजों को चुनौती देने वाले, साहूकारों का विरोध करने वाले, किसानों को कर्जमुक्त कराने वाले तथा स्वतंत्रता के लिए समर्पित राघोजी भांगरा को 2 मई 1848 को ठाणे जेल में फांसी दी गई। अंतिम समय में उन्होंने तलवार या बंदूक से वीरगति देने की इच्छा व्यक्त की थी। महादेव कोळी समाज के इस क्रांतिकारी वीर ने फांसी पर चढ़कर बलिदान दिया।
मुगलों से संघर्ष कर पराक्रम दिखाने वाली गढ़ामंडला की रानी दुर्गावती ने शत्रु के हाथों मरना स्वीकार न करते हुए स्वयं खंजर से वीरगति प्राप्त की। उनकी प्रजा और राज्य सुखी व संतुष्ट थे। इसी गढ़ामंडला राज्य को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए गोंड राजा शंकरशाह और उनके पुत्र रघुनाथशाह ने सेना संगठित कर प्राणपण से युद्ध किया। “हम स्वतंत्र राजा हैं, अंग्रेज यहाँ से चले जाएँ, अन्यथा तलवार से अपना राज्य वापस लेंगे” — ऐसी गर्जना शंकरशाह ने की। लगभग 3000 गोंड सैनिकों के साथ स्वतंत्रता युद्ध शुरू हुआ। एक कार्यक्रम में मैकग्रेगर ने शंकरशाह की हत्या कर दी और संघर्ष भड़क उठा। बाद में शंकरशाह और रघुनाथशाह पकड़े गए तथा 18 सितंबर 1857 को पिता-पुत्र को तोप से उड़ा दिया गया। यह वीरमरण आदिवासी इतिहास में अमर है। 1857 के इस स्वतंत्रता संग्राम में वे महान क्रांतिकारी थे, लेकिन इतिहासकारों ने आदिवासी क्रांतिकारियों को उचित स्थान नहीं दिया।
संथाल जनजाति के तिलका मांझी सन् 1750 के आसपास एक क्रांतिकारी नेता के रूप में उभरे। उन्होंने हिंदू-मुसलमानों को साथ लेकर अंग्रेजों और इजारेदारों के खिलाफ मुंगेर और भागलपुर क्षेत्र में जोरदार युद्ध लड़े। 13 जनवरी 1784 को उन्होंने ताड़ के पेड़ पर चढ़कर क्लीवलैंड की छाती पर धनुष-बाण चलाया। कई दिनों तक अंग्रेजों के साथ संघर्ष चलता रहा। लड़ते समय तिलका मांझी पकड़े गए। अंग्रेजों ने उन्हें चार घोड़ों से बांधकर घसीटते हुए भागलपुर लाया और एक पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी। फांसी के बाद भी उनके शरीर में कीलें ठोंकी गईं। भूमि स्वायत्तता और स्वतंत्रता के लिए शहीद होने वाले वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम सेनानियों में गिने जाते हैं। उनके जीवन पर फिल्म क्यों नहीं बन सकी — यह आज भी एक प्रश्न है।
अदिलाबाद क्षेत्र के गोंड वीर भिमुकुमरा, जिनका जन्म सकोपल्ली गांव में हुआ, अंग्रेजों के अत्याचार के कारण अपना गांव छोड़कर वावेझरी पहाड़ क्षेत्र में गए। वहां भी संघर्ष जारी रहा और उन्होंने भोरघाट नाम की नई बस्ती बसाई। जमीन और अत्याचार के खिलाफ उन्होंने अंग्रेजों से विद्रोह किया। संघर्ष के दौरान उनके साथी पकड़े गए और अंततः भिमुकुमरा अंग्रेज पुलिस से लड़ते हुए शहीद हो गए।
क्रांतिवीर बापुराव पुल्लेसुर शेडमाके की संघर्षपूर्ण क्रांतिकारी भूमिका बिरसा मुंडा के समान मानी जाती है। उनका जन्म 12 मार्च 1833 को अहेरी के पास किष्टापुर में हुआ और 21 अक्टूबर 1858 को मात्र 25 वर्ष की आयु में वे शहीद हुए। उन्होंने जमीन और स्वतंत्रता के लिए सेना संगठित कर संघर्ष किया। 10 मई 1858 की घोट की लड़ाई प्रसिद्ध हुई। बापुराव पकड़े गए, परंतु साखलदंड तोड़कर स्वयं को मुक्त कर लिया। बाद में लालचवश उनकी ही एक रिश्तेदार ने उन्हें पकड़वा दिया। 21 अक्टूबर 1858 को चंद्रपुर जेल के पीपल के पेड़ पर दोपहर 4:30 बजे उन्हें फांसी दी गई। लोककथाओं में कहा जाता है कि उनके गले में फंदा कसना कठिन हो रहा था। 1857 के विद्रोह के इस शहीद ने अपने बलिदान से क्रांति की कहानी लिख दी। कम उम्र में अंग्रेजों से लड़ते हुए फांसी पर चढ़ने वाले इन बहादुर आदिवासियों को भारतीय क्रांतिकारियों का उचित दर्जा न मिलना आज भी एक पहेली है।
आदिवासियों के रोंगटे खड़े कर देने वाले रोमांचक प्रसंग मन को झकझोर देते हैं। मनुष्य स्तब्ध रह जाता है कि जंगलों और घाटियों में रहने वाले ये स्वाभिमानी लोग किस तरह लड़े होंगे। वीरता की भी एक सीमा होती है, परंतु भूख और अन्याय से जूझते लोगों ने अपने अस्तित्व और स्वतंत्रता के लिए अद्भुत साहस दिखाया। महादेव कोळी समुदाय ने सन् 1657 में जुन्नर की मुस्लिम सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए खेमा के नेतृत्व में विद्रोह किया। मुगल बादशाह ने असंख्य सैनिक भेजकर महादेव कोळियों को पकड़ लिया, उनके सिर काट दिए और उन सिरों के ढेर पर चबूतरा बनवाया — इस घटना की तुलना दूसरे जलियांवाला बाग से की जाती है। स्वतंत्रता, समता और न्याय के लिए दिए गए इन बलिदानों को कोई नहीं भूल सकता।
खाज्या नाईक ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया। अंबापाणी में 460 स्त्री-पुरुषों की हत्या की गई और 55 आदिवासियों को मार दिया गया। खाज्या नाईक का सिर काटकर नीम के पेड़ पर आठ दिनों तक लटकाया गया। स्वतंत्रता और स्व-अस्तित्व के लिए लड़ने वाला यह वीर शहीद हुआ। राजस्थान के मानगढ़ में अंग्रेजों ने एक साथ लगभग 1500 आदिवासी वीरों पर गोलियां चलाकर शवों का ढेर लगा दिया। आदिवासियों की स्वतंत्रता की यह गाथा भुलाई नहीं जा सकती। भूमि, स्वतंत्रता, शोषण के विरोध और अस्मिता की रक्षा के लिए हुए आदिवासी संघर्षों को समझे बिना इस देश की क्रांति का इतिहास अधूरा रहेगा।
मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए गुलामी को ठुकराकर अंग्रेजों पर आक्रमण करने वाले आदिवासी अत्यंत साहसी और क्रांतिकारी थे। केरल के राजा पदमसी करूचि और करू मारो जनजाति का 1812 का संघर्ष, असम की खासी जनजाति के क्रांतिकारी वीरतिर्थसिंह द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ किया गया हमला और उम्रकैद के दौरान उनकी मृत्यु — ये सब उदाहरण हैं। 1831-32 के लारका विद्रोह के नायक शहीद बुधू भगत को बचाने के लिए समर्थकों ने 300-400 रक्षकों का घेरा बनाया, पर अंततः अंग्रेजों की गोली से वे शहीद हो गए। अहमदनगर जिले के महादेव कोळी वीर रामजी भांगरा और रामा किरवा को 1830 में फांसी दी गई। बाराभूम जिले में आदिवासियों को लूटने वाले लक्ष्मणसिंह को मारकर अंग्रेजों के विरुद्ध भूमिज सेना संगठित करने वाले और 1833 में शहीद हुए वीर गंगा नारायण का बलिदान भी अविस्मरणीय है।
ओडिशा राज्य के पराक्रमी चक्र बिशोई सन् 1880 तक कंध (कन्या) क्षेत्र के स्वतंत्र राज्य के लिए प्राणपण से संघर्ष करते रहे। वे शत्रुओं के हाथ न लगते हुए अचानक लुप्त हो गए। अक्कलकुवा के कुंवरसिंह वसावा ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित किया और अंग्रेजों के हस्तक्षेप के विरोध में हाथ में बंदूक लेकर विद्रोह किया। संथाल जनजाति का राज्य स्थापित करने की घोषणा करने वाले सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव ने स्वतंत्रता की पहली उद्घोषणा की। उन्होंने कई टुकड़ियाँ बनाकर धनुष-बाण, तलवार, भाला और कुल्हाड़ी जैसे हथियारों से सुसज्जित सेना तैयार की। सिद्धू-कान्हू का विद्रोह आद्य विद्रोह माना जाता है।
खानदेश के भिमा नायक का अंग्रेजों पर जबरदस्त प्रभाव रहा। उन्होंने भिल्लों के स्वाभिमान की लड़ाई अत्यंत साहस के साथ लड़ी और सन् 1867 का समय उनके शौर्य से गूंज उठा। भिल्लों और महादेव कोळियों के विद्रोह का नेतृत्व भागोजी नाईक ने किया। उन्होंने अंग्रेजों को चेतावनी दी कि वे हथियार नहीं डालेंगे। आक्रामक होते हुए भागोजी ने पीछे से एक पुलिसकर्मी को गोली मारी और तुरंत दूसरी गोली से हेंडी को मार गिराया। भागोजी ने सिन्नर, संगमनेर और पारनेर के मामलतदारों को आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया। 45 साथियों के साथ युद्ध करते हुए भागोजी वीरगति को प्राप्त हुए और उनकी मृत्यु के बाद उनके परिवार का भी संहार किया गया।
क्रांतिवीर होन्या केंगले, राजस्थान के गोविंद गुरु, असहकार आंदोलन में सक्रिय ताना भगत, आंध्र प्रदेश में अन्याय-अत्याचार के विरुद्ध उठे शहीद चंद्रया तथा ओडिशा के लक्ष्मण नायक का योगदान भी उल्लेखनीय है। 1942 के आंदोलन में 21 अगस्त को गिरफ्तार हुईं दशरीबेन चौधरी असहकार आंदोलन से जुड़ी थीं और किसानों के लगान न भरने के आंदोलन में सक्रिय रहीं। इस आदिवासी क्रांतिकारी महिला ने स्वदेशी के पक्ष में भाषणों और गीतों के माध्यम से जनजागरण किया तथा जेल में रहते हुए कस्तूरबा गांधी से साक्षरता के पाठ सीखे।
आदिवासी क्रांतिकारियों का इतिहास अत्यंत विशाल और दैदीप्यमान है। इस इतिहास से मिले सबक भारत की सामाजिक व्यवस्था को अवश्य ग्रहण करने होंगे। आज आदिवासियों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन उनकी भूख से होने वाली मौतें नहीं रुकीं। कुपोषण के कारण इस देश में आदिवासी समुदाय के हजारों बच्चे दफन हो रहे हैं। आदिवासी भूमिहीन हो गया है, जंगल की संपत्ति पर उसका अधिकार नहीं रहा। उसकी सुविधाएँ नकली आदिवासियों ने लूट लीं, और संविधान में मिले अधिकारों को छीनने वाले लुटेरे पैदा हो गए। स्वाभिमानी और ईमानदार लोग भी आज परायों के इशारों पर चलने लगे हैं। क्रांतिकारी और शूरवीरों का इतना बड़ा इतिहास होने के बावजूद लाचारी उनके हिस्से में आ गई है। विज्ञान के युग में भी आदिवासियों का शोषण जारी है।a
आदिवासियों को अपना इतिहास जानकर नया इतिहास रचने के लिए आगे आना चाहिए। गुलामी का इतिहास आदिवासियों के खून में नहीं है। अपने अधिकारों और विकास के लिए जागने की आवश्यकता है। संविधान में आदिवासियों के अधिकार सुरक्षित हैं, उनके लिए आयोग है और स्वायत्त प्रशासन की छठी अनुसूची भी है। लाचारी छोड़कर एक नए स्वतंत्रता संग्राम के लिए, अपने शोषण को रोकने हेतु आदिवासियों को संवैधानिक लड़ाई की आवश्यकता है। इस संघर्ष में प्राणपण से नेतृत्व करने वाले लोग तैयार होने चाहिए।
ब्लॉग से जुड़ने के लिए निम्न व्हाट्सएप ग्रुप जॉइन करे...


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें