मुख्यधारा में आदिवासी
– डॉ. दिलीप गिऱ्हे
समाज की तथाकथित मुख्यधारा में
आदिवासी की पहचान
अक्सर उसके अपने नाम से नहीं,
बल्कि दिए गए नामों से होती है—कभी वनवासी,
कभी हरिजन,
कभी गिरिजन,
तो कभी जंगली कहकर पुकारा जाता है।उसे गँवार भी कहा जाता है,
नक्सली कहकर डराया भी जाता है,
कोयला और लकड़ी चोर कहकर
उसकी मेहनत को अपराध बना दिया जाता है।कभी राक्षस, कभी दानव, कभी असुर—
मिथकों के बोझ तले दबाकर
उसकी असल पहचान छीन ली जाती है।नंगे बदन वाला कहकर
उसकी गरीबी पर हँसा जाता है,
और बड़े-बड़े मंचों पर
उसे केवल नाचने-गाने तक सीमित कर दिया जाता है—
जैसे उसकी पूरी संस्कृति
बस एक प्रदर्शन रह गया हो।पर सच यह नहीं है…
सच इससे कहीं गहरा है।आदिवासी का इतिहास
किसी एक किताब में नहीं मिलता,
वह बिखरा हुआ है—
जंगलों की सरसराहट में,
पहाड़ों की खामोशी में,
और नदियों की बहती धारा में।वह इतिहास यह कहता है
कि आदिवासी केवल एक पहचान नहीं,
बल्कि इस धरती के मूल निवासी हैं—
जल, जंगल और जमीन के असली मालिक।उन्होंने प्रकृति को केवल संसाधन नहीं माना,
बल्कि माँ समझकर उसकी रक्षा की,
उसके साथ जीना सीखा,
और उसे संतुलित बनाने का पाठ सिखाया।लेकिन मुख्यधारा ने
उन्हें समझने की कोशिश नहीं की,
बल्कि उन्हें अपने ढाँचे में ढालने की कोशिश की—
और उसी में उनकी अस्मिता को
धीरे-धीरे धुंधला कर दिया।आज ज़रूरत है
उस बिखरे इतिहास को समेटने की,
उस सच्चाई को सामने लाने की,
जो आदिवासी जीवन की आत्मा है।क्योंकि जब तक
उनकी असली पहचान नहीं समझी जाएगी,
तब तक मुख्यधारा अधूरी ही रहेगी।आदिवासी कोई हाशिए की कहानी नहीं,
बल्कि इस देश की जड़ों की पहचान हैं—
जिनसे ही इस समाज का अस्तित्व जुड़ा हुआ है।

1 टिप्पणी:
सुंदर कविता
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