मंगलवार, 19 मार्च 2024

भाषा से कुछ झलकता है (काव्य लेखन) Bhasha Se Kuch Jhalakata Hai ....Kavita Lekhan

 


 

भाषा से कुछ झलकता है

– डॉ. दिलीप गिऱ्हे 

भाषा से व्यक्तित्व झलकता है,
शब्दों में मन का दर्पण मिलता है,
जैसी होती है सोच हमारी,
वैसी ही अभिव्यक्ति निकलता है।

भाषा से अस्तित्व झलकता है,
जीवन का आधार दिखता है,
हर बोली में छिपा हुआ
एक पूरा संसार दिखता है।

भाषा से पहचान झलकती है,
अपनी मिट्टी की खुशबू आती है,
हर उच्चारण में कहीं न कहीं
संस्कृति की छवि मुस्काती है।

भाषा से संस्कृति के रंग झलकते हैं,
रीति-रिवाजों के संग झलकते हैं,
परंपराओं की गहराई भी
शब्दों के भीतर ढंग से बसते हैं।

भाषा से भाषण-कौशल झलकता है,
विचारों का विस्तार दिखता है,
जो कहने का ढंग सलीके से हो,
वही मन को स्वीकार दिखता है।

भाषा से किया हुआ भाष्य झलकता है,
ज्ञान और अनुभव का स्वर झलकता है,
चाहे वह मधुर हो या कटु सत्य,
हर शब्द में एक असर झलकता है।

भाषा केवल बोल नहीं होती,
यह मन की गहराई कहती है,
अनकहे भावों की छाया बनकर
यह मौन में भी बहुत कुछ कहती है।

कभी यह प्रेम का सेतु बनती है,
कभी दूरी भी बढ़ा देती है,
शब्दों की शक्ति ऐसी होती है,
जो हृदय को छू या तोड़ देती है।

इसलिए भाषा का प्रयोग करो सोच-समझकर,
यह तुम्हारी पहचान बन जाती है,
तुम्हारे हर शब्द के साथ
तुम्हारी छवि दुनिया में उतर जाती है।

और भी न जाने भाषा से क्या-क्या
हर पल झलकता रहता है,
मानव जीवन का हर रंग
इसी के माध्यम से बहता है।


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