उलगुलान: एक प्रतीक है
– डॉ. दिलीप गिऱ्हे
उलगुलान एक प्रतीक है—
यह सिर्फ शब्द नहीं, एक पुकार है,
मुंडारी भाषा की आत्मा में
गूंजता हुआ हुंकार है।
उलगुलान एक प्रतीक है—
उस मिट्टी की आवाज़ का,
जहाँ हर कण में बसा है
प्रतिरोध और स्वाभिमान का इतिहास।
उलगुलान एक प्रतीक है—
मुंडा आदिवासियों के विद्रोह का,
जो अन्याय के विरुद्ध
आग बनकर भड़क उठता है,
और हर बेड़ी को तोड़ डालता है।
उलगुलान एक प्रतीक है—
आंदोलन की उस चेतना का,
जो सोई हुई आत्माओं को जगाती है,
जो डर को चुनौती देती है,
और संघर्ष को जीवन बना देती है।
उलगुलान एक प्रतीक है—
नेतृत्व की उस अद्भुत शक्ति का,
जहाँ बिरसा की एक पुकार
जन-सैलाब बन जाती है,
और तीर-धनुष
सिर्फ हथियार नहीं—
स्वाभिमान की गर्जना बन जाते हैं।
उलगुलान एक प्रतीक है—
एकता और संगठन का,
जहाँ हजारों कदम
एक दिशा में बढ़ते हैं,
और इतिहास खुद रास्ता बदल देता है।
उलगुलान एक प्रतीक है—
उस अडिग विश्वास का,
जो हार को भी चुनौती देता है,
जो हर अंधेरे में
एक नया सूरज खोज लेता है।
उलगुलान एक प्रतीक है—
अंग्रेजी सत्ता के भय को तोड़ने वाली
निर्भीक चेतना का,
जो झुकना नहीं जानती,
जो रुकना नहीं जानती।
उलगुलान एक प्रतीक है—
जलती हुई मशाल का,
जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी
रास्ता दिखाती रहती है,
जो अंधकार से लड़ना सिखाती है।
उलगुलान एक प्रतीक है—
अन्याय पर न्याय की विजय का,
जहाँ सत्य दबता नहीं—
उठता है, चमकता है और जीतता है।
उलगुलान एक प्रतीक है—
आज भी हर उस आवाज़ का,
जो अन्याय के खिलाफ उठती है,
जो अत्याचार को ललकारती है।
उलगुलान एक प्रतीक है—
जल, जंगल और जमीन की रक्षा का,
उस संस्कृति का
जो प्रकृति को माँ मानती है,
और उसके साथ जीना सिखाती है।
उलगुलान एक प्रतीक है—
इतिहास और एक जीवित चेतना का,
जो हर पीढ़ी से कहता है—
उठो…
संघर्ष करो…
क्योंकि स्वतंत्रता
कभी भी बिना संघर्ष के नहीं मिलती।

4 टिप्पणियां:
बहुत बढ़िया
बहुत बढ़िया
Bahut badhiya sir ji
प्रेरणा दाऐ वक्तव्या
एक टिप्पणी भेजें