सोमा डोमा आंध की याद में…
– डॉ. दिलीप गिऱ्हे
इतिहास के पन्नों से बेदखल
एक और नाम—
एक और आदिवासी क्रांतिकारी योद्धा,
सोमा डोमा आंध।वे केवल एक व्यक्ति नहीं थे,
बल्कि संघर्ष की वह ज्योति थे
जो यवतमाल की धरती पर
स्वाभिमान बनकर जलती रही।आंध जनजाति के वीर पुत्र,
जिनकी नसों में बहता था
जंगलों का हरा साहस,
और धरती का अटूट आत्मबल।यवतमाल के जंगलों को बचाने के लिए
जब उठी थी लूट और शोषण की आंधी,
तब धुंदी जंगल आंदोलन की मशाल
सोमा डोमा ने ही थामी थी।वे खड़े हुए—
जंगल, जल और जमीन के अधिकार के लिए,
उन्होंने ललकारा हर उस ताकत को
जो प्रकृति और मनुष्यता को कुचलना चाहती थी।जमींदारों और साहूकारों के
अन्याय-अत्याचार के खिलाफ
वे बन गए आवाज़,
वे बन गए प्रतिरोध का स्वर—
जो दबाया तो जा सकता था,
पर मिटाया नहीं जा सकता था।लेकिन विडंबना देखिए—
मुख्यधारा के इतिहास ने
उनके संघर्ष को अनदेखा किया,
उनकी गाथा को
अपने पन्नों में जगह नहीं दी।फिर भी इतिहास की चुप्पी से परे
जन-स्मृति में वे जीवित हैं—
हर उस जंगल की सरसराहट में,
हर उस आवाज़ में
जो न्याय की मांग करती है।हम उन्हें याद करते हैं—
9 मार्च और 10 दिसंबर को,
सिर्फ तिथियों में नहीं,
बल्कि अपने संघर्षों की चेतना में।हर साल बार-बार—
उनकी स्मृति को नमन करते हुए,
उनके अधूरे सपनों को
अपने संकल्पों में जीवित रखते हुए।सोमा डोमा केवल एक नाम नहीं,
एक प्रतीक हैं—
उस साहस का,
जो अन्याय के सामने झुकता नहीं,
जो संघर्ष में ही अपनी पहचान पाता है।

5 टिप्पणियां:
Ye to dil ko lubhane wali kavitaye hai..........
Andh aadiwasi yoddhayo ke bare main bahut hi achhese vistarit kiya hain.
Nice poem
Nice poem
इस कविता की माध्यम से हमे gyat होता है आदी शादी के आलाव हम हमारी बेटी को education दियातो वो अगे जाएगी
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