आरक्षण
– डॉ. दिलीप गिऱ्हे
सवर्णों की नज़रों में
आरक्षण अक्सर
एक “भीख” कहा जाता है,
एक सुविधा,
एक अनुचित लाभ के रूप में देखा जाता है।लेकिन…
संविधान की नज़रों में
आरक्षण कोई भीख नहीं,
बल्कि अधिकार है—
न्याय का अधिकार,
समान अवसर का अधिकार।यह वह व्यवस्था है
जो सदियों से चले आ रहे
असमानताओं के अंधेरे को
धीरे-धीरे मिटाने का प्रयास करती है।आरक्षण केवल एक नीति नहीं,
यह प्रतिनिधित्व का माध्यम है—
उन आवाज़ों का प्रतिनिधित्व,
जो लंबे समय तक
दबाई जाती रहीं,
अनसुनी रह गईं।यह वह प्रतिनिधित्व है
जो समाज के हर तबके को
समान भागीदारी देता है,
और एक ऐसे समाज की कल्पना करता है
जहाँ अवसर
जन्म से नहीं,
योग्यता और अधिकार से तय हों।आरक्षण का उद्देश्य
किसी को नीचे गिराना नहीं,
बल्कि सबको
समान धरातल पर लाना है—
जहाँ कोई ऊँच-नीच न हो,
कोई भेदभाव न हो।यह सामाजिक न्याय का सेतु है,
जो विभाजनों को पाटता है
और भाईचारे की भावना को
मजबूत करता है।इसलिए आरक्षण को
सिर्फ एक शब्द या नीति के रूप में नहीं,
बल्कि एक संघर्ष की उपलब्धि,
और एक समतामूलक समाज की दिशा में
उठाया गया आवश्यक कदम समझना होगा।
.jpg)
2 टिप्पणियां:
Right sir 👍
एक टिप्पणी भेजें