परिवर्तन की लहर…
– डॉ. दिलीप गिऱ्हे
परिवर्तन की लहर
एक दिन में नहीं उठती—
वह धीरे-धीरे जन्म लेती है,
विचारों की गहराइयों में,
चेतना की मिट्टी में।यह लहर शुरू हुई—
गौतम बुद्ध के विचारों से,
जहाँ करुणा, समता और तर्क ने
मानवता को एक नई दिशा दी।समय आगे बढ़ा—
तो इस लहर को स्वर मिला
संत कबीर की वाणी में,
संत रविदास के संदेश में,
संत तुकाराम और
संत नामदेव के अभंगों में—
जहाँ भक्ति के साथ-साथ
समानता का बीज बोया गया।फिर यह लहर और प्रबल हुई—
ज्योतिराव फुले और
सावित्रीबाई फुले के प्रयासों से,
जिन्होंने शिक्षा को हथियार बनाकर
अज्ञान के अंधकार को चुनौती दी।यह लहर वीरता में भी बहती रही—
रानी दुर्गावती की शौर्यगाथा में,
झलकारीबाई के साहस में।सामाजिक न्याय की दिशा में
इसे शक्ति मिली—
शाहूजी महाराज की नीतियों से,
और यह लहर एक आंदोलन बन गई
डॉ. भीमराव अम्बेडकर के नेतृत्व में—
जहाँ समानता, न्याय और अधिकार
एक संकल्प बन गए।दक्षिण में इसकी गूंज सुनाई दी—
ई.वी. रामासामी पेरियार के विचारों में,
और जंगलों में यह गूंजी—
बिरसा मुंडा के उलगुलान में।यह लहर संघर्ष की नई कहानियाँ लिखती रही—
फूलन देवी के विद्रोह में,
टंट्या भील के प्रतिरोध में,
रामदयाल मुंडा के चिंतन में,
सोमा डोमा आंध और बाबूराव शेडमाके के संघर्षों में।आधुनिक समय में—
इस लहर को दिशा मिली
कांशीराम के संगठन से,
और मंडल आयोग के निर्णयों से
समानता की नई राह खुली।इन सभी बहुजन महापुरुषों ने
इस लहर को आगे बढ़ाया—
शिलालेखों में,
भाषणों में,
पत्र-पत्रिकाओं में,
और पुस्तकों में—
जहाँ हर शब्द
एक क्रांति का बीज बन गया।और आज—
यह लहर सीमाओं में नहीं बंधी,
यह पहुँच चुकी है
हर हाथ में, हर स्क्रीन पर।बहुजन युवाओं ने
फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर जैसे माध्यमों से
इस चेतना को
पूरे संसार में फैला दिया है।अब यह लहर
सागर की लहरों जैसी उफन रही है—
जो रुकती नहीं,
जो थमती नहीं,
जो हर बाधा को तोड़ती हुई
आगे बढ़ती जाती है।यह लहर केवल परिवर्तन की नहीं,
समता, न्याय और मानवता की है—
जो एक नए समाज की रचना के लिए
उत्सुक, जागृत और संकल्पित है।

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