अस्तित्व
-डॉ. दिलीप गिऱ्हे
इस संसार में
प्रत्येक वस्तु का अपना एक अस्तित्व है—
चाहे वह वृक्ष हो,
जो धरती में जड़ें जमाकर
आकाश से संवाद करता है;चाहे वह पशु-पक्षी हों,
जो प्रकृति की लय में जीते हुए
जीवन का संतुलन बनाए रखते हैं;या फिर मानव हो,
जो अपने विचारों, कर्मों और संघर्षों से
अपनी पहचान गढ़ता है।हर एक का अस्तित्व
केवल उसका होना नहीं,
बल्कि उसकी अस्मिता की गहरी पहचान है।अस्तित्वहीन कोई नहीं होता,
और होना भी नहीं चाहिए—
क्योंकि अस्तित्व ही
किसी भी वस्तु का इतिहास है,
उसकी यात्रा है,
उसकी कहानी है।जिसका अस्तित्व नहीं,
उसकी कोई पहचान नहीं;
वह समय की धूल में
कहीं खो जाता है।इसीलिए—
अस्तित्वहीनता केवल शून्य नहीं,
बल्कि विस्मृति है,
जहाँ न नाम बचता है,
न कोई निशान।पहचान बनाने के लिए
अस्तित्व को बनाए रखना आवश्यक है,
उसे संजोना पड़ता है,
उसे बचाना पड़ता है—
हर परिस्थिति में,
हर संघर्ष के बीच।क्योंकि अस्तित्व ही
वह दीप है,
जो अंधकार में भी
अपनी लौ से पहचान कराता है।जब कोई अपने अस्तित्व को समझता है,
उसे स्वीकार करता है,
और उसे सशक्त बनाता है—
तभी उसकी पहचान
समाज में उजागर होती है।तभी वह
सिर्फ भीड़ का हिस्सा नहीं रहता,
बल्कि अपनी अलग छाप छोड़ता है।अस्तित्ववान व्यक्ति,
अस्तित्ववान समाज—
अपने संघर्षों से निखरते हैं,
अपनी जड़ों से जुड़कर
और अधिक सशक्त होते हैं।और तब—
वे चौबीस कैरेट सोने की तरह
समय की कसौटी पर
खरे उतरते हैं,
चमकते हैं,
और अपनी पहचान को
अमर बना देते हैं।इसलिए—
अस्तित्व को पहचानो,
उसे बचाओ,
उसे सशक्त बनाओ—क्योंकि
अस्तित्व ही जीवन है,
अस्तित्व ही पहचान है,
और अस्तित्व ही
हमारी सबसे बड़ी सच्चाई है।

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