बुधवार, 8 अप्रैल 2026

जसिंता केरकेट्टा के काव्य में मातृभाषा की मौत || Jacinta kerketta ki kavita-Matrubhasha ki Mout

 


जसिंता केरकेट्टा के काव्य में मातृभाषा की मौत

-Dr Dilip Girhe 

प्रास्ताविक:

आज मातृभाषा के अस्तित्व का संकट दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है इसके कारण मानवीय संवेदनाओं पर घहरा आघात पहुँच रहा है। जसिन्ता करकेट्टा ने इन सभी बातों को गहरे प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत करने की कोशिश की है। उन्होने यह भी बताया है कि मातृभाषा किस प्रकार से हमारे अस्तित्व और पहचान की आधारशिला होती है। यह पहचान एवं अस्तित्व आज धीरे-धीरे खत्म होते जा रहा है। 'मातृभाषा की मौत' कविता का विषय एक ऐसी समस्या के रूप में सामने आ रहा है। जो समस्या दिखाई नहीं देती किन्तु पीढ़ी दर पीढ़ी उसे खोखला कर देती है। कविता में माँ उस पीढ़ी का प्रतीक है जिसने अपने बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष करके अपनी मातृभाषा को त्याग दिया। उसे यह त्याग सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दबाव के चलते हुआ। आज के आधुनिक जीवन शैली के दौर में रोजगार और बेहतर जीवन को साबित करने के लिए मातृभाषा को पीछे छोड़ दिया गया है। कवयीत्री कहना चाहती है कि मातृभाषा की मृत्यु कोई प्राकृतिक विपदा नहीं है, बल्कि यह जानबूझकर की गई सुनियोजित प्रक्रिया है। जिसे लागू करने के लिए सत्ता, समाज और बाजार की बड़ी भूमिका रही है। इसे भाषाई लोप के साथ-साथ पहचान, परंपरा और स्मृतियों का खो जाना भी कहा जा सकता है। इस तरह यह कविता अपनी जड़ों की ओर लौटने एवं मातृभाषा के संरक्षण करने के लिए प्रेरित करती है।

मातृभाषा की मौत 

माँ के मुँह में ही 

मातृभाषा को क़ैद कर दिया गया 

 और बच्चे 

उसकी रिहाई की माँग करते-करते 

 बड़े हो गए। 

मातृभाषा ख़ुद नहीं मरी थी 

उसे मारा गया था 

पर, माँ यह कभी न जान सकी। 

रोटियों के सपने 

दिखाने वाली संभावनाओं के आगे 

अपने बच्चों के लिए उसने 

भींच लिए थे अपने दाँत 

और उन निवालों के सपनों के नीचे 

दब गई थी मातृभाषा। 

 माँ को लगता है आज भी 

एक दुर्घटना थी।

-जसिन्ता केरकेट्टा

कवि जसिन्ता केरकेट्टा ने  अपनी कविता में मातृभाषा की मौत को अत्यंत मार्मिक और प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। कविता के आरंभ में ही कहा गया कि 'माँ के मुँह में ही मातृभाषा को कैद कर दिया गया'  यहाँ पर कवि ने माँ को स्त्री के रूप में न देखते हुए सम्पूर्ण आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व पात्र माना है। जिस प्रकार माँ एक परिवार मातृसत्तात्मक के रूप द्वितीय स्थान दिया जाता है। उसी प्रकार से माँ द्वारा सीखी गई मातृभाषा को भी दबाया जाता है। आज बच्चे अपनी माँ की भाषा यानी मातृभाषा को सीखना पसंद करते हैं। इसी वजह से वह 'रिहाई' की मांग कर रहे हैं। किंतु समय के साथ वे जिस तरह से बड़े हो रहे हैं उसी तरह से वे अपनी मातृभाषा को भी भूल रहे हैं। आदिवासी कवयित्री बताती है कि आजकल के दौर में मातृभाषा स्वयं नहीं मरी, बल्कि उसे मारा जा रहा है।कवयित्री यह स्पष्ट करती हैं कि मातृभाषा स्वयं नहीं मरी, बल्कि उसे मारा गया। यह कथन भाषा के विनाश के पीछे छिपी साजिश और संरचनात्मक असमानताओं को उजागर करता है। शिक्षा प्रणाली, प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक प्रतिष्ठा की धारणाएँ ऐसी बन गई हैं, जहाँ स्थानीय भाषाओं को महत्व नहीं दिया जाता। कवयित्री जसिंता ने कहा है कि कविता में ‘रोटियों के सपने’ एक महत्वपूर्ण प्रतीक के रूप में सामने आते हैं। माँ अपने बच्चों को बेहतर जीवन देना चाहती है, इसलिए वह उन संभावनाओं को चुनती है, जो आर्थिक रूप से सुरक्षित हों। इसी प्रक्रिया में वह अपनी मातृभाषा को पीछे छोड़ देती है। यह त्याग उसके लिए आसान नहीं है-वह अपने दाँत भींचकर इस पीड़ा को सहती है। धीरे-धीरे, जीवन की आवश्यकताओं-रोटी, रोजगार और सुरक्षा—के नीचे मातृभाषा दब जाती है और उसका अस्तित्व समाप्त होने लगता है। सबसे दुखद बात यह है कि माँ को यह लगता है कि यह सब एक ‘दुर्घटना’ है, जबकि वास्तव में यह एक योजनाबद्ध प्रक्रिया का परिणाम कहा जा सकता है। इस प्रकार जसिंता केरकेट्टा अपनी कविता के माध्यम से यह दिखाती हैं कि मातृभाषा की मौत केवल शब्दों का अंत नहीं, बल्कि एक पूरी संस्कृति, इतिहास और पहचान का लोप है।

जसिंता केरकेट्टा आगे कहती है कि ‘मातृभाषा की मौत’ एक गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक त्रासदी के रूप में उभरती है। यह कविता हमें यह समझाने का प्रयास करती है कि भाषा का खोना केवल संवाद का संकट नहीं, बल्कि अस्तित्व का संकट है। आज के वैश्वीकरण और बाज़ारवाद के दौर में जहाँ अंग्रेज़ी और अन्य प्रभावशाली भाषाओं का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा है, वही दूसरी ओर देखा जाए तो मातृभाषाएँ धीरे-धीरे हाशिए पर जा रही हैं। आदिवासी और स्थानीय समुदायों के लिए यह स्थिति और भी गंभीर बनती जा रही है, क्योंकि उनकी भाषा ही उनकी पहचान का सबसे बड़ा आधारस्तंभ होती है। कविता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि हमें इस ‘मौत’ को दुर्घटना मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, बल्कि इसके पीछे के कारणों को समझ कर उसपर उपाययोजना करना आवश्यक है। ताकि शिक्षा, समाज और शासन—सभी स्तरों पर मातृभाषा को सम्मान और स्थान मिल सकें है। अंततः यह कविता हमें चेतावनी देती है कि यदि हम अपनी मातृभाषाओं को नहीं बचाएँगे, तो हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कट जाएँगे। इसलिए हमें आधुनिकता के साथ-साथ अपनी भाषाई विरासत को भी संजोकर रखना होगा। यही हमारी पहचान और अस्तित्व की रक्षा का मार्ग है।

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