साहित्य में जीवंतता
– डॉ. दिलीप गिऱ्हे
साहित्य में जीवंतता तब जन्म लेती है,
जब शब्द केवल शब्द नहीं रहते,
बल्कि अनुभवों की धड़कन बन जाते हैं।जब साहित्यकार
अपनी प्रत्यक्ष अनुभूतियों को
ईमानदारी से कागज़ पर उतारता है,
तब उसके हर एक पंक्ति में
जीवन की सच्चाई झलकती है।जब लेखन सतही नहीं,
गहराइयों में उतरता है,
तब हर विचार को
मनन और चिंतन की अग्नि में तपाया जाता है।जब उस पर संवाद होता है,
विचारों का आदान-प्रदान होता है,
तब चर्चा के बीच
नई दृष्टियाँ जन्म लेती हैं।जब उसके गुण-दोषों को
निष्पक्षता से परखा जाता है,
तब आलोचना उसे कमजोर नहीं,
बल्कि और अधिक सशक्त बनाती है।जब साहित्य केवल पढ़ा नहीं जाता,
बल्कि जीवन में जिया जाता है,
तब उसके विचार
व्यवहार में उतरते हैं।जब वह मनोवैज्ञानिक स्वरूप धारण कर
मानव मन की गहराइयों को छूता है,
और भीतर छिपे भावों को
आवाज़ देता है।
तब विद्यार्थी और शिक्षक
दोनों उसमें डूब जाते हैं,
और शिक्षा केवल पाठ्यक्रम नहीं,
अनुभव बन जाती है।जब साहित्य में समाज का हित समाहित होता है,
तब वह जन-जीवन का दर्पण बनता है,
और यथार्थ को
साहस के साथ सामने लाता है।जब साहित्य में सुख-दुख, हर्ष-विषाद,
संघर्ष और संवेदना का
सजीव चित्रण मिलता है,
जो पाठक के हृदय को आंदोलित कर दे।तब उसकी आलोचना होती है,
जब उसका विरोध और प्रतिरोध होता है,
तभी वह विचारों की कसौटी पर
खरा उतरता है।जब उसे पढ़कर
किसी और के भीतर भी
लिखने की चाह जाग उठती है,
और सृजन की नई धारा बहने लगती है।तब साहित्य केवल रचना नहीं रहता—
वह एक जीवित सत्ता बन जाता है,
एक स्पंदन, एक चेतना,
जो सजीव वस्तु की तरह
समय के साथ सांस लेती हैं।

4 टिप्पणियां:
✌️✌️✌️
Sahi hai
Very nice sirji 🌹🌹🌹🌹🌹🙏
Bahut badhiya sir ji
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