जंगल और आदिवासी पर संकट
—डॉ. दिलीप गिऱ्हे
जिस तरह से जंगल कट रहे हैं,
उसी तरह से आदिवासी भी मिटाए जा रहे हैं,
बस फर्क इतना है कि—
जंगलों पर चलती कुल्हाड़ियाँ अब दिखाई नहीं देतीं,
वे 'विकास' के नाम पर
बड़े-बड़े पूंजीपतियों के बुल्डोज़रों में बदल गई हैं...!पेड़ों की चीख अब सुनाई नहीं देती,
क्योंकि मशीनों का शोर
उनकी कराह को दबा देता है,
हरी-भरी धरती को
कंक्रीट के जंगलों में बदल देता है...!और आदिवासी...
उन्हें भी काटा जा रहा है—
पर कुल्हाड़ी से नहीं,
बल्कि नामों और आरोपों से—
कभी 'माओवादी' कहकर,
कभी 'नक्सलवादी' बताकर,
कभी 'कोयला चोर' का ठप्पा लगाकर,
उनकी अस्मिता को कुचला जा रहा है,
उनके अस्तित्व को मिटाया जा रहा है...!कटे हुए जंगल की लकड़ियाँ
शहरों की ऊँची-ऊँची इमारतों में ढल रही हैं,
विलासिता के महलों को खड़ा कर रही हैं,
और उसी विकास के नीचे
किसी की जड़ें उखड़ रही हैं...!और उधर—
कटी हुई आदिवासियों की लाशें
सिर्फ आंकड़ों में बदल दी जाती हैं,
फाइलों के पन्नों में सिमट जाती हैं,
कभी 'ऑपरेशन की सफलता' कहलाती हैं,
तो कभी किसी अधिकारी के
'प्रमोशन' की सीढ़ी बन जाती हैं...!जंगल रो रहे हैं,
आदिवासी भी रो रहे हैं,
पर उनकी आवाज़
सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुँचती...!यह केवल पेड़ों का विनाश नहीं,
यह एक पूरी सभ्यता का अंत है,
यह केवल जमीन का अधिग्रहण नहीं,
यह पहचान और अस्तित्व की लड़ाई है...!अब वक्त है—
जंगल को सिर्फ संसाधन नहीं,
जीवन समझने का,
आदिवासी को सिर्फ आंकड़ा नहीं,
इंसान समझने का...!वरना एक दिन
जब जंगल पूरी तरह खत्म हो जाएंगे,
तो इंसान भी
अपने अस्तित्व की तलाश में भटकता रह जाएगा...!

2 टिप्पणियां:
Aadiwasiyo ka aur jungle ka sangharsh bahut achhese bataya hain. Jo pida jungle ki ho rahi hain , usi pida se aaj aadiwasi log bhi ja rahe hain.
जो बाते हमने कभी सोची ही नहीं थी... उसके बारे मैं लिखकर आपने आदिवासी लोगो के लिये जो सहकार्य किया... उसे शब्दो मैं बया करणा आसान नही हैं. धन्यवाद सर जी........
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