रविवार, 14 अप्रैल 2024

गोंडाइत आदिवासी समुदाय

 


गोंडाइत आदिवासी समुदाय

-Dr.Dilip Girhe 

प्रस्तावना:

झारखंड के छोटानागपुर के जंगलों से ढके पर्वतीय प्रदेश में रहलाने वाला गोंडाइत समुदाय है। वर्तमान में यह समूह गैर-आदिवासियों के संपर्क में ज्यादा आया हुआ दिखता है। इनके जीविकापार्जन के साधन हैं- खेती बारी, मजदूरी, जंगल से बनी वस्तुएं और बाजा बजाकर आदि। यह लोग प्रोटो अस्कोलाईड श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। भाषाई अस्मिता की बात करे तो यह समूह ऑस्ट्रिक श्रेणी के अंतर्गत आता है। गैर-आदिवासियों के संपर्क में आने की वजह से वे उनकी भी भाषा बोलते हैं।

सामाजिक व्यवस्था:

गोंडाइत आदिवासी समुदाय कई टोटम में विभक्त है। जिसे गोत्र कहा जाता है। इनके गोत्र हैं-इन्दवार, खालखो, टोपवार, धान, केरकेट्टा, सोन, तिर्की आदि। गोंडाइत समूह की सामाजिक व्यवस्था पितृप्रधान है। पिता के बाद उनके बेटे का सम्पति पर अधिकार होता है। अविवाहित होने तक बेटी पिता के संपति पर अधिकार रख सकती है। रिजले कहते हैं कि “वर-वधु एक दूसरे की ललाट पर सिंदूर लगाकर विवाह संस्कार पूरा करते हैं। गोंडाइत समाज में सेवा विवाह, गोलात, राजी ख़ुशी, ढूकू विवाह प्रचलित है। वधु कीमत (डाली) की प्रथा गोंडाइत समाज में है। जिसमें वर पक्ष द्वारा वधु के माँ-बाप एवं परिवार को पैसा एवं कुछ सामान देने पड़ते है। गोंडाइत समाज में तलाक की भी परंपरा है।”[1]

गोंडाइत आदिवासी पारंपरिक रूप से ही ढोल बजाने का काम करता है। बावजूद इसके वे कृषि, पालेदार का भी काम करते हैं। सन् १९८१ की जनगणना के अनुसार कृषक ३४.७५, कृषक मजदूर २९.५२, श्रमिक ३४.८८ प्रतिशत आंकड़ें है।

पंचायत व्यवस्था:

इनकी पंचायत व्यवस्था सात गांवों से मिलकर बनती है। यह सातों गाँव नजदीक के ही होते हैं। पंचायत व्यवस्था का जो मुखिया होता है उसे ‘डारिया’ कहा जाता है। इसे मदद करने के लिए 'उपडारिया' या फिर 'कोतवाल' होता है। इस प्रकार से इनकी पंचायत व्यवस्था होती है।

पर्व-त्योहार:

गोंडाइत आदिवासी प्राकृतिक संसाधनों की पूजा करते है। यानि वह प्रकृति पूजक होते हैं। वे अपने गोत्र-देवताओं की भी प्रार्थना करते हैं। इनके प्रमुख त्योहार सरहुल, करमा और जीतिया है।   

जनसँख्या:

१९८१ के जनगणना के मुताबिक इनकी जनसंख्या ५२२६ थी। इसमें पुरुष २६७१ और महिलाएं २५३५। यही आंकडें १९९१ के अनुसार ४९८८ है जो की कुल जनसंख्या के ०.०९ है। इस प्रकार से गोंडाइत आदिवासी समुदाय की सामाजिक व्यवस्था, पंचायती व्यवस्था, पर्व-त्योहार एवं उनकी जनसँख्या के बारे संक्षेप में जानकारी देख सकते हैं।

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[1] झारखंड एन्साइक्लोपीडिया खंड-४ पृष्ठ संख्या. १५

गोंडी संस्कृति के जनक ‘पारी कुपार लिंगो’ की जन्म लोककथा

 


गोंडी संस्कृति के जनक ‘पारी कुपार लिंगो’ की जन्म लोककथा

   ऐसा कहा जाता है कि लोककथा में लिंगों का जन्म पहांदी वृक्ष के फूल में हुआ है। एक समय में बहुत ही तेजी से वर्षा की झड़ी लग रही थी। सब नदी-नाले लबालब भरकर बहने लगे। पेनगंगा नदी भी भरकर बहने लगी। सब तरफ भारी मात्रा में बाढ़ आ गई। बिजली गरजने से धरती कापने लगी। पहांदी वृक्ष नदी के किनारे फूलों से बहर रहा था। उस वृक्ष के एक फूल पर तेजपुज गिर पड़ा। उससे सभी फूल नदी में गिरे और कुछ समय बाद उसी जगह पर भंवर चक्र आया। सभी फूल उसमें गिरने लगे और घूमने लगे। बारिश, बिजली, तूफान की गर्जना से सभी ओर धरती कापने लगी। बहुत समय बाद यह सब गतिविधियाँ शांत हो गई। जहाँ पर भवर चक्र घूम रहा था वह तो निकल गया किन्तु वहाँ पर जो फूलों का गुच्छ था वह तैरते-तैरते पहांदी वृक्ष के नीचे आ गया। उसी फूलों पर एक सुंदर तेजस्वी बालक दिख पड़ा। उसका संपूर्ण शरीर चांदी जैसे चमक रहा था। 

इसीलिए उसका नाम ‘रूपोलंग’ दिया गया। रूपोलंग गोंडी भाषा का शब्द है। पहांदी वृक्ष के फूल से लिंगो का जन्म हुआ। इसीलिए उनको ‘पारी कुपार लिंगो’ कहते हैं। उस बालक का समाचार वहाँ के राजा-रानी पुलशिव और हिरबा को दे दीया गया। वहाँ वे उस बालक को ले गए और उन्होंने उसे अपना पुत्र माना। आगे चलकर यही लिंगो महामानव बना। जिस पहांदी वृक्ष से लिंगो का जन्म हुआ। उस वृक्ष को ‘काटसावरी’ कहा जाता है। गोंडी भाषा में इसे ‘कटोरा’ कहते हैं। गोंड आदिवासी समुदाय इसे अपना देववृक्ष मानते हैं। ऐसी मान्यताएं प्रचलित हैं कि इसी वृक्षों के पत्तों से तीन व चार देवों की निर्मिती हुई।

फरवरी माह में इसी वृक्षों को फूल आते हैं। संपूर्ण वृक्ष के भागों पर कांटे रहते हैं। किन्तु फूल बहुत ही सुंदर और आकर्षक होते हैं। पूरे साल भर में एक बार फूल आते हैं। नर पंखुड़ी ६-६ के दल में होते हैं। इसी पंखुड़ियों एवं पत्तों के गणित से ही देवताओं का विभाजन किया गया। इसी वजह से गोंडी संस्कृति के लोकगीत, लोककथा एवं सामाजिक व्यवस्था में इस वृक्ष को अधिक पवित्र स्थान है। इस वृक्ष के फूलों की संरचना भी काफी आकर्षक है। उससे गोंडी के १२ सगाओं का विभाजन किया गया है। यह फूल फरवरी के माघ महीने में फूलते-खिलते हैं। इसी महीने में इसी फूलों से लिंगों का जन्म हुआ। यानि की पहांदी वृक्ष के फूल जब फूलते-खिलते रहते हैं। उसी वक्त लिंगों का जन्म हुआ है। इसीलिए गोंड समुदाय द्वारा उनका जन्मोत्सव इसी महीने में मनाया जाता है।

इस प्रकार से इन सभी संदर्भों एवं तथ्यों के अनुसार हम कह सकते हैं कि गोंडी संस्कृति के जनक ‘पारी कुपार लिंगो’ की जन्म लोककथा काफी प्रचलित एवं लोकप्रिय है।     

इसे भी पढ़े...गोंड़ जनजाति 

संकलन प्रस्तुति-Dr. Dilip Girhe

संदर्भ

उषाकिरण आत्राम-गोंडवाना में कचारगढ़ पवित्र भूमि

डॉ. अम्बेडकर और आदिवासी DR. AMBEDKAR AUR AADIWASI

 


डॉ. अम्बेडकर और आदिवासी

-Dr.Dilip Girhe

डॉ. भीमराव अम्बेडकर की समाज व्यवस्था

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने भारतीय समाज में समतामूलक तत्त्वों को स्थापित किया है। उनका भारतीय संविधान का लेखन समाज के हर एक तबके को न्याय देता हैं। कुछ लोग मानते हैं कि डॉ. अम्बेडकर ने सिर्फ दलितों के उद्धार के लिए कार्य किया है। यह उनका कथन सारासार गलत है। भारतीय संविधान ही इसका प्रतिउत्त्तर है। कुछ आदिवासी बौद्धिक वर्ग भी डॉ. अम्बेडकर ने आदिवासियों के लिए कुछ नहीं किया है। ऐसा प्रतीत करता है। जो लोग यह सब कहते हैं कि डॉ. अम्बेडकर ने आदिवासियों के लिए कुछ नहीं किया है। उन सभी ने डॉ. अम्बेडकर को सही ढ़ंग से नहीं पढ़ा। सिर्फ एक-दो किताब पढ़कर ऐसा कहना बिल्कुल गलत है। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र भारत की संरचना बहुत ही सुन्दर तरीके से स्थापित करने डॉ. अम्बेडकर एकमात्र महापुरुष है। कुलमिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि ‘चींटी से लेकर हाथी तक’ प्रकृति में जितने भी जीव-जंतु रहते हैं। उनके समान ही अम्बेडकर भारतीय समाज के हर एक तबके को न्याय दिया है।

कुछ आदिवासी साहित्य के जानकर के मत...

कुछ आदिवासी साहित्य के जानकर का कहना है कि डॉ. अम्बेडकर ने भारतीय संविधान में ‘अनुसूचित जनजाति’ की जगह ‘आदिवासी’ शब्द प्रयोग नहीं किया है। इस वजह से डॉ. अम्बेडकर पर सवाल उठाते हैं। शायद उनका ज्ञान कम है इसीलिए ऐसे बोलते हैं। अम्बेडकर ने सबसे पहले सभी मुद्दों का अध्ययन किया। तभी ‘अनुसूचित जनजाति’ शब्द प्रयोग भारतीय संविधान में किया। जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान सभा में ‘आदिवासी’ शब्द कहने की मांग की थी। परन्तु इस पर डॉ. अम्बेडकर बहुत विचार-विमर्श करने बाद ही ‘अनुसूचित जनजाति’ शब्द की अनुमति दे दी। इसकी मूल वजह यह है कि ‘आदिवासी’ या ‘मूलनिवासी’ शब्द सामान्यसूचक है।

डॉ. अम्बेडकर की मूलनिवासी संकल्पना

इसका संदर्भ यह है कि भारत देश मूलनिवासियों का देश कहा जाता है। यहाँ का हर एक बहुजन मूलनिवासी है। यह आर्य-अनार्य संकल्पना है। भारत में अनार्य वंश के जितने भी वर्ग मिलते हैं। वे ‘मूलनिवासी’ जिसे ‘आदिवासी’ कहा जाता है। सभी अनार्य वंश के लोग आदिवासी कैसे हो सकते हैं। तो यह विवाद का विषय हो सकता था। इस वजह से कानून के शब्दों में आदिवासी को अनुसूचित जनजाति शब्द पर ही डॉ. अम्बेडकर ने मुहर लगाई। यह समाजीकरण की दृष्टिकोण से उचित है। नहीं तो आज कोई भी खुद को ‘आदिवासी’ या ‘मूलनिवासी’ कहकर अनुसूचित जनजातियों के हक़, अधिकार, योजनाओं पर दावा करता था। इसी वजह से कानून के शब्द में ‘अनुसूचित जनजाति’ ही उचित है।      

विलुप्त होती महाराष्ट्र से जनजातियाँ (विशेष संदर्भ: नाईकडा एवं ओरान-धनगड)

विलुप्त होती महाराष्ट्र से जनजातियाँ 

(विशेष संदर्भ: नाईकडा एवं ओरान-धनगड)

-Dr.Dilip Girhe

नाईकडा:

आदिवासी समुदाय का महाराष्ट्र सरकार के अनुसूचित जनजाति गजेट के क्रमांक ३५ पर नाम है। यह आदिवासी समूह महाराष्ट्र के धुले जिले में मुख्य रूप से पाया जाता है। इनकी जनसँख्या कम है। गुजरात राज्य के बलसाड, पंचमहाल, सूरत और रेवाकाठा जिले में इनकी संख्या पाई जाती है। नाईकड़ा का अर्थ होता है ‘नायका’ या ‘नाईक’। कपाडिया नायका, चोलिवाला नायका, बड़ा नायका, नाना नायका उपशाखा हैं। इसमें से कपाडिया नायका और बड़ा नायका इनका स्थान सामाजिक दृष्टिकोण से ऊपर माना जाता है। ‘नायकी तत्सम भीली’ उनकी बोली भाषा है। साथ ही साथ वे मराठी भाषा भी बोलते हैं। भील आदिवासी समूह से यह समूह भिन्न है। इस समूह में आदिवासी स्त्री अपने शरीर ‘गोंदन’ करती है। इस समूह में खास पंचायत व्यवस्था भी होती है। जिसका प्रमुख होता है उसे ‘अगिवान’ कहते हैं। गुजरात राज्य में स्थित ‘देसवाडा’ स्थान उनका पवित्र स्थान माना जाता है।

ओरान-धनगड:

ओरान आदिवासी समुदाय का महाराष्ट्र सरकार के ‘अनुसूचित जनजाति गजेट’ के क्रमांक ३६ पर नाम है। ओरान धनगड आदिवासी समूह द्रविड़ भाषा परिवार से आता है। वर्तमान में महाराष्ट्र से यह समूह विलुप्त होता दिखता है। इनका वास्तव्य मध्यप्रदेश, ओड़िसा एवं पश्चिम बंगाल में पाया जाता है। ओरान आदिवासी समूह का ही प्रादेशिक नाम ‘धनगड’ है। उसका अर्थ ‘किसान’ होता है। यह समूह अनेक गोत्रों में विभाजित किया गया है। खेती और उसको पूरक व्यवसाय उनका प्रमुख काम है। वर्तमान में इस आदिवासी समूह से बहुतांश लोगों ने धर्मांतरण किया है। उनके देवी-देवता हैं- धरम माता, चंडी और घोषाल। वे इनकी पूजा करते हैं। पर्व-त्योहारों में ‘सरहुल’ उनका प्रमुख पर्व है। गाँव के प्रमुख को ‘पाहन’ कहा जाता है। उनकी एक सामाजिक व्यवस्था भी है जिसे ‘धुमकुरिया’ कहा जाता है। महाराष्ट्र में धनगर एक ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ की जात है। जिसका उल्लेख महाराष्ट्र सरकार के अन्य पिछड़ा वर्ग गजेट के क्रमांक ३२ पर नाम है। यानि की ‘धनगड’ व ‘धनगर’ बिल्कुल अलग-अलग है। इस प्रकार से महाराष्ट्र की विलुप्त होती जनजतियों की प्रमुख जानकारी को हम देख सकते हैं। 

संदर्भ-

डॉ.गोविन्द गारे-महाराष्ट्रातील आदिवासी जमाती